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कैसे बताऊँ तुम मेरे कौन हो....?

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कैसे बताऊँ तुम मेरे कौन हो….?


kaise bataaun tum meri kaun ho...?


कैसे बताऊँ,तुम मेरी कौन हो………………?



तुम दीद,..तुम प्रीत,…….तुम रीत,………तुम सुबह…..तुम शाम……..तुम नदिया……तुम

घाट……तुम पावन सरिता …..तुम निर्झर धार………तुम पनघट……..तुम नय्या…..तुम पतवार……तुम

मलिहार …….तुम मेरे जीवन का सार हो…….


कैसे बताऊँ,तुम मेरी कौन हो………………..?


तुम अर्पण…….तुम दर्पण…..तुम तर्पण…..तुम धुप………तुम छाओं…….तुम प्यार……तुम

ऐतवार……तुम करार……तुम इकरार……..तुम बहार………..तुम चलो ..तो चले…….जीवन

धार……………..तुम रुको तो रुक जाए संसार…


कैसे बताऊँ,तुम मेरी कौन हो………………..?


तुम सुरूर……तुम मेरा गरूर…….तुम ख्वाब……..तुम नींद…….तुम शबाब……..तुम

कजरा……तुम गजरा……तुम कमल……तुम गुलाब………..तुम फूल……….तुम कलियाँ……..तुम हरियाली

अपार हो…..


कैसे बताऊँ,तुम मेरी कौन हो……………..?


तुम सूरज…..तुम चंदा…….तुम नदिया…….तुम

पहाड़……..तुम बादल………..तुम फुहार………तुम बारिश……..तुम रिमझिम बरसात…….तुम

पवन……….तुम गगन………..तुम सरस सलिल मस्त बहार…..


कैसे बताऊँ,तुम मेरी कौन हो……………..?


तुम मेरे अपने……….तुम मेरे सपने……….तू है तो ये जहां है………….तेरी छाओं में तो

ये जीवन अपना है ……….तू रूठे……तो बन जाये बीराना…….तू हँसे,तो छलके पैमाना………………जैसे मोतियों

के हार………गजरे की माल……………..एक एहसास,जैसे झोंका कोई हबा का,……………….मानो कोई

फ़रिश्ता,आकर धीरे से छू गया…………….तू शौक…..तू ज़ौक……..तू महकशी………..तू दिल्लगी……तू

ज़िन्दगी……तू महकदा…………तुम मेरा हर जवाब हो….


कैसे बताऊँ,तुम मेरी कौन हो………………?


तेरी चाल …….जैसे ढोलक की ताल……तू इतराए……तू शर्माए…….तू

लजाये…………..सब कुछ मेरे जी को भाये………..तू है तो मई हूँ,तू नहीं तो मैकदे को महास्त्तर

हूँ…………………..तू जो जुल्फों को लहराए……मानो बादलों की घटा छाये…………तेरा रूठना….तेरा

मनाना…..येही है मेरे जीवन की कहानी……..तू ही है,मेरे जीवन का फ़साना……..


कैसे बताऊँ तुम मेरी कौन हो……………..?.

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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

saima malik के द्वारा
October 3, 2010
rajkamal के द्वारा
October 3, 2010

सेमा जी ..आप को देख कर इस मंच के वरिष्ठ ब्लोगर सचिन भाजी की याद ताज़ा हो आई … जो की आजकल पांडवो से चौसर की बजी हारकर लंबे अज्ञातवास में चले गए है … उनके ब्लॉग पर भी कमेन्ट पर जवाब का आप्शन नहीं था … इस समस्या से निजात पाने का एक ही तरीका है की … सुसाइड करके फिर से दुबारा जानम लिया जाए … और जब तक यह समस्या बनी रहे तब तक फिर -२ से जानम लेते रहो … खुशनसीबो को ही ऐसे अवसर मिला करते है …. गंभीर बाते तो बहुत ही हो गई है … अब कुछ हलकी फुलकी भी :- एक एहसास,जैसे झोंका कोई हबा का,……………….मानो कोई फ़रिश्ता,आकर धीरे से छू गया…………….तू शौक…..तू ज़ौक……..तू महकशी………..तू दिल्लगी……तू ज़िन्दगी……तू महकदा…………तुम मेरा हर जवाब हो…. सेमा जी …तुम मेरा हर जवाब हो…. की जगह क्या कुछ और नहीं होना चाहिए था ? क्या यह लाइन सही है ? वेसे सारी कविता अपने आप में अदभुत और अनूठी है .. बधाई

rajkamal के द्वारा
October 3, 2010

सेमा जी ..आप को देख कर इस मंच के वरिष्ठ ब्लोगर सचिन भाजी की याद ताज़ा हो आई … जो की आजकल पांडवो से चौसर की बजी हारकर लंबे अज्ञातवास में चले गए है … उनके ब्लॉग पर भी कमेन्ट पर जवाब का आप्शन नहीं था … इस समस्या से निजात पाने का एक ही तरीका है की … सुसाइड करके फिर से दुबारा जानम लिया जाए … और जब तक यह समस्या बनी रहे तब तक फिर -२ से जानम लेते रहो … खुशनसीबो को ही ऐसे अवसर मिला करते है …. गंभीर बाते तो बहुत ही हो गई है … अब कुछ हलकी फुलकी भी :- एक एहसास,जैसे झोंका कोई हबा का,……………….मानो कोई फ़रिश्ता,आकर धीरे से छू गया…………….तू शौक…..तू ज़ौक……..तू महकशी………..तू दिल्लगी……तू ज़िन्दगी……तू महकदा…………तुम मेरा हर जवाब हो…. सेमा जी …तुम मेरा हर जवाब हो…. की जगह क्या कुछ और नहीं होना चाहिए था ? क्या यह लाइन सही है ? वेसे साडी कविता अपने आप में अदभुत और अनूठी है .. बधाई

rajkamal के द्वारा
October 3, 2010

सेमा जी …आपको देख कर मुझको हमारे सचिन भाजी की याद आ गई …. जो की आजकल पांडवो से चोसर की बाज़ी हारकर किसी अज्ञातवास में चले गए है …. उनके ब्लॉग पर कमेन्ट पे जवाब का आप्शन नहीं था …. तो इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए सुसाइड करके फिर से दुबारा जन्म लेना पड़ता है… तो जब तक यह समस्या बनी रहे …नए पे नए जन्म लेते रहो …. किसी खुशनसीब को ही यह मौका मिलता है …. मेरी आदरणीय शाही जी से गुजारिश है की सेमा जी की तो पहले से ही नोकरी लगी हुई है …अगर मेरे लिए कोई नोकरी निगाह में हो तो क्या मैं भी अपना बाओ डाटा भेज सकता हू … गंभीर बाते तो बहुत हो गई… अब कुछ हलकी फुलकी …. एक एहसास,जैसे झोंका कोई हबा का,……………….मानो कोई फ़रिश्ता,आकर धीरे से छू गया…………….तू शौक…..तू ज़ौक……..तू महकशी………..तू दिल्लगी……तू ज़िन्दगी……तू महकदा…………तुम मेरा हर जवाब हो…. सेमा जी …बहुत ही अच्छी मगर अपने में अनूठी कविता है … किन्तु एक शंका भी है… तुम मेरा हर जवाब हो…. क्या यह लाइन यहाँ पर इसी रूप में फिट होती है …या फिर कुछ और हो सकता था ….

saima malik के द्वारा
October 3, 2010

शाही जी ,आप सभी लोगों की शंका समाधान हेतु,मेरा निजी परिचय प्रस्तुत है…. वैसे तो,प्रकृति ने मानव जैसी “अशरफुल-मख्लुकात” का सृजन,अपनी सबसे सुन्दर प्रतिकिर्ती के रूप में किया,जो स्रजनकर्ता के अनमोल कृति है,क्या स्त्री…….क्या पुरुष……क्या लड़की…क्या लड़का……बस हमने एक वर्गीकरण किया,सम्पूर्ण मानव जाती को दो बराबर हिस्सों में बाँट दिया……और संभवता स्रष्टा के प्रति मानव का ये सबसे बड़ा विश्वासघात है…….. फिर भी,…..मै सायमा मलिक उस आधी जनसँख्या का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वम को गौरवान्वित अनुभूत करती हूँ,जिसे नारी कहते हैं. मै सायमा मलिक (नारी) ,आयु २७ वर्ष,जाति- अराईन/ राइन (मलिक) धर्म इस्लाम शैक्षणिक योग्यता-बी.एस.सी.(बायो.) बी.एड.(स्पेशालाईज़ेशन इन एजुकेशनल कम्प्यूटिंग) ,एप्लाईड एम्.एड.,विशिष्ट बी.टी.सी………..एक सामाजिक कार्यकर्त्ता……एक जन सूचना अधिकार कार्यकर्त्ता……..यु.एन.ओ. वालनटेयर,एवं कंटेंट रायटर

saima malik के द्वारा
October 3, 2010

     परम आदार्णीय आर.एन. शाही जी को हमारा नमस्कार शाही जी,आपकी शंका का समाधान प्रस्तुत है,और आप एवं माननीय मंसूर जी के प्रति मेरे ह्रदय में एक अपूर्व मान एवं श्रद्धा है,कि लगता है,जाने कौन अनजाना सा रिश्ता….सा….रिश्ता…एक स्वर्गिक ….अपनत्व….ममत्व…..बात्सल्य…सा प्रखरित होता है,आपकी तिप्पधियों से……..और जब आप मेरी किसी भूल और त्रुटी के संवंध में मुझे कुछ राय देतें हैं,तो ये मान और सम्मान और भी बड़ जाता है…….सचमुच हमारी भूलों….हमारी गलतियों …..को एक सच्चा शुभ चिन्तक ही रेखांकित कर सकता है,…….वरना इस भौतिकवादी आधुनिक कहे जाने वाले समाज में,इतनी फुर्सत किसे है,कि वो आपकी रचनाएं पड़े,आपकी गलतियां रेखांकित करे…….और आपको उनसे अवगत कराये….जबकि वो और आप एक अजनबी हों…..सचमुच आपके सौहार्दपूर्ण स्नेह के लिए हम ह्रदय से आभारी हैं….

saima malik के द्वारा
October 3, 2010

श्रीवर आर.एन. शाही जी,एवं सभी के लिए सायमा मलिक की और से साधुवाद आदार्णीय शाही जी,माननीय मंसूर जी,श्री निखिल पांडे एवं धर्मेश जी,साथ ही अबोध बालक नाम से मेरी रचनाओं पर टिप्पड़ी लिखने वाले सभी सज्जनों का हम कि सायमा मलिक ह्रदय से धन्यबाद देते हैं,और आशा करतें हैं,कि आप सभी शुभचिंतकों का हमें भविष्य में भी ऐसा ही मान-सम्मान मिलता रहेगा,और प्रत्येक त्रुटी अथवा विसंगति को सुधारने में आप लोगों के मार्गदर्शन के हम हरपाल अभिलाषी हैं….

मंसूर के द्वारा
October 3, 2010

प्रेम गंगा की रसधार बहाती रचना।  कृपया देखें ’चलें, धर्म की ओर’ sdvajpayee.jagranjunction.com  

abodhbaalak के द्वारा
October 3, 2010

i am dedicated my this draft to “abodhbaalak@gmail.com” and hope with them for positive use in further.i am to lucky and glad with your quote,and messaged to all of you that-”life is just like an ice-cream,taste it before it to be melt” and advising all of you “that love is a power of devine,but it is also a factor of decline” thanks towards saima ji, i have posted my comment but it is not visible on ur blog, therefore i m sending it again. i would not like to comment on whatever u have written here. i would just like to request you give me permission to use it/send it to send it. hope u understand how much i liked ur poem/ghazal one of the best i have ever read.

abodhbaalak के द्वारा
October 3, 2010

i am permitted to you this,and allowed you for positive use of my draft any where. साय्मा जी, मै ज्यादा कुछः नही लिखून्गा कि आपकी कविता कैसी है, बस आपसे रेकुएस्त है कि मुज्हे इसके प्रयोग कि आज्ञा दे दे तकि मै कहि किसी के पास इसे लिख कर भेज सकून। उम्मीद है कि आप समजः हि गयी होन्गी कि ये कविता मुज्हे कैसी लगी http://abodhbaalak.jagranjunction.com

आर.एन. शाही के द्वारा
October 3, 2010

अन्दरूनी भावनाओं का सैलाब सा बहता प्रतीत हुआ । बधाई सायमा जी । एक व्यक्तिगत बात, जो बहुत दिनों से कहना चाह रहा था, आज नहीं रोक पा रहा हूं । इसका समाधान आपही कर सकते/सकती हैं । कई ब्लागर अपनी प्रतिक्रियाओं में आपको लिखते समय पुरुष मान कर चलते हैं, और कुछ लोग स्त्री या कन्या । मैं स्त्री/कन्या मानने वालों में से रहा हूं । आपने दोनों की प्रतिक्रियाएं स्वीकार कीं, भले जवाब न दिया हो । परन्तु आपने किसीकी की भी शंका का समाधान करना उचित नहीं समझा, कि मैं ये नहीं वो हूं, कोई गलत न समझे । ये बात मुझे उचित नहीं प्रतीत होती है । रहस्यमय बन कर रहना कई शंकाओं को जन्म देता है । कृपया बुरा मत मानेंगे/मानेंगी । हो सके तो शंका का समाधान करने का प्रयास करेंगे/करेंगी । धन्यवाद ।

roshni के द्वारा
October 3, 2010

Sayma ji bahut badiya rachna ………

मंसूर के द्वारा
October 3, 2010

कभी किसी से सुना था कि जीवन में हर कोई, शुष्‍क- नीरस भी , कम से कम एक बार कविता जरूर करता है। जो ऐसा नहीं करता वह संत- फकीर होता है या फिर असामान्‍य। आप ने तो पूरी प्रेम-गंगा ही बहा दी। रचना को और इसकी अनुभूतियों को प्रणाम।  ”चलें, धर्म की ओर । ” की खोज खबर लें ।मुझे बिषय को आगे समझने में आसानी हो सकती है।

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 3, 2010

बेशक काफी बिंदास अंदाज और प्रस्तुति तो कमाल की.. बस यु ही पढ़ते जाने का जी कर रहा था… आपने तो स्तुति में सारा जब बिछा दिया .. बढ़िया रचना

मंसूर के द्वारा
October 3, 2010

मैं कभी किसी से सुना था कि कैसा नीरस- शुष्‍क जीवन में एक बार तो उसके दिल कविता की रसधार फूट निकलती ही है। ऐसा न होने पर वह संत -फकीर होगा या फिर असामान्‍य। आपने तो  प्रेम-गंगा ही बहा दी। ‘ चलें, धर्म की ओर ‘ की कुछ खोज खबर लें।इससे मुझे बिषय को समझने में आसानी हो सकती है।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 3, 2010

बहुत सुन्दर प्रस्तुती,बधाई

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 3, 2010

नमस्कार,बहुत सुन्दर प्रस्तुती,बधाई thanks to you from Saima Malik

zarargotha के द्वारा
October 3, 2010

सायमा मलिक जी,—————आर यु फालिंग इन लव,नाउ-इ-डेज़——बहुत दिनों के बाद,पुन:जागरण जंक्शन पर आपका ब्लॉग देखकर और पड़कर अच्छा लगा—-आप के लेखों की विषय विभिन्नता,सचमुच आपको और ब्लॉगर की श्रेडी से अलग,एक नई और विशिष्ठ पहचान देती है,और इस बार तो आपने मानलो प्यार में सराबोर होकर अपनी लेखनी से शब्द बिखेरे है,जो बहुत ह्रदयस्पर्शी एहसास देतें हैं.धन्यबाद

praveen sharma के द्वारा
October 3, 2010

बिलकुल बिंदास है……आजकल के प्रेमियों के लिए छकास है………दिल को छू लेने वाले शब्द,और कुछ नया प्रयास,है इसकी ज़रूरत aajkal


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