Achche Din Aane Wale Hain

ufo,paranormal,supernatural,pyramid,religion and independence movement of india,bermuda,area 51,jatingha

53 Posts

294 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1814 postid : 200

भयंकर दुर्घटना के कगार पर कोयला खदाने

Posted On: 17 Oct, 2010 Others,न्यूज़ बर्थ में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

जैसा कि आपने हाल में प्रदर्शित फिल्म २०१२ में धरती के धंसने के द्रश्य देखे,वे महज़ एक निर्माता कि सोच और कम्पुटर ग्राफिक्स का कमाल ही नहीं,निकट भविष्य में वास्तविक होने कि संभावना है,और ऐसी घटनाएं वर्तमान दशक में हारत ही नहीं,अन्य देशों में भी हुई हैं.पर धरती धंसने कि ये घटने,इतने छोटे रूप में हुई,कि किसी ने अभी तक इस दिशा में कोई विचार नहीं किया. हमने भूमिगत जल के अन्धाधुन्त विदोहन,प्राकृतिक संसाधनों,पेट्रोलियम,कोयला,अभ्रक,पत्थर,संगमरमर,ग्रेफाईट,लौह अयस्क का अंधाधुन्द खनन कर अपनी धरती को खोकला बनाने में कोई कसार नहीं छोड़ी है,कोयला खानों से कोयला सुरक्षा नियमों कि पूरी अनदेखी करते हुए खाना किया जा रहा है,जबकि नियमानुसार खनन के बाद रिक्त स्थान को बालू से भरा जाना चाहिय,बालू न भरने से दूसरा सबसे बड़ा नुक्सान,कोयला खदानों में दुर्घटना वश आग लग जाने पर होता है,क्योंकि ये रिक्त स्थान आग संचरण के लिए…………..आग में घी का काम करते हैं,………….और दुर्घटना वश लगी आग किलोमीटरों में संचारित हो जाती है,और ऐसी आग पर काबू पाना असंभव नहीं तो,कठिन तो है ही…………………दूसरी बात,कोयला उत्खनन से खाली हुई परित्यक्त खानों में इतना कोयला तो शेष रह जाता है,कि दुर्घटना वश लगी आग वर्षों तक इनमें जलती रहती है……………..प्रयोग में न लाये जाने के कारण,इनमें लगी आग को बुझाने के भारी धनराशी व्यय न तो उत्खनन करने वाली फार्म लगाना चाहती है,और नाही इस घाटे के सौदे में सरकार ही रूचि दिखाती है,तीसरी बात ये है कि ऐसी आग दुर्घटना पर नियंत्रण के न तो प्रयाप्त संसाधन हमारे पास हैं,न ही इस आग को बुझाने में अभी हम सक्षम हैं………………….

सिघ्भूमि……………झरिया……………….आदि जैसे झारखंड एवं बिहार कि कई खाली कोयला खदानों में वर्षों से आग सुलग रही,जिसे भुझाया नहीं जा सका है, दोनों प्रदेशों के कई शहर और कसबे ऐसी ही खोकला कोयला खानों के ऊपर खतरे के ढेर पर बसे हैं,…………जहां कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है,……………….कुछ कस्वों के नीचे वर्षों से बुमिगत आग सुलग रही है……………..कई स्थानों पर ये आग धरती के ऊपर भी प्रकट हो जाती है. वर्तमान में ज्ञात प्राकृतिक संसाधनों के भंडार,यदि इसी प्रकार खर्च किये जाते रहे,तो वो दिन दूर नहीं,जब पेट्रोलियम पदार्थ(खनिज तेल) कोयला,अभ्रक,तांबा,जल,लौह अयस्क आदि इस पृथ्वी की दुर्लभतम वस्तुओं की सूचि में नज़र आयेंगे.एक अनुमान के अनुसार,यदि आगामी समय में विश्व इसी गति से इन प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुन्द उपयोग करता रहा,और कोई नया भण्डार नहीं खोजा जा सका,तो अगले ३० से ४० वर्षों में विश्व से पेट्रोलियम पदार्थ/खनिज तेल ख़त्म हो जाएगा,इसी दशा में कोयला केवल आगामी १६ वर्षों में समाप्त हो जाएगा,जल तो निश्चित रूप से आगे कुछ ही वर्षों दुर्लभतम वस्तुओं में शामिल हो जाएगा,अन्य संसाधनों का भी कुछ ऐसा ही हाल अगले २० से ५० वर्षों के दौरान हो सकता है.

अगले ३० से ५० वर्षों के बाद,विश्व में केवल वे ही सभ्यताएं और देश अपनी अर्थव्यवस्था और अवश्यक्तायों की पूर्ति में संभव हो पाएंगे,जिनके पास प्रयाप्त प्राकृतिक संसाधनों का वृहद एवं सुरक्षित भण्डार होगा.यदि आगामी भविष्य में २०-३० वर्षों के दौरान किन्हीं कारणों वश “संभावित तृतीय विश्व युद्ध” होता है,तो ये अवस्था विश्व की सभी प्रमुख महासक्तियों के समक्ष पूर्व ही उत्त्पन्न हो जायेगी.



एक प्रसिध्य वैज्ञानिक के आकलन के अनुसार,यदि भाविष्य में “तृतीय विश्व युद्ध” किन्हीं कारणों से लड़ा गया,तो उसकी बिभिशिका से मानव सभ्यता लगभग अपंग हो जायेगी,संभावना तो यहाँ तक है कि “संभावित तृतीय विश्व युध्य” होने कि स्थिति में,हो सकता है मानव अपने वंश को ही खो दे,और इस हरित पृथ्वी से मानव वंशीय समस्त जनसँख्या समूल नष्ट हो जाये.यदि ऐसे किसी युद्ध के बाद मानव सभ्यता यदि बच भी गयी तो वो इस परिस्थिति में होगी……..कि चौथा विश्व मानव “तीर-कमान और भालों” से लड़ा जायेगा.

एक गोपनीय सुचना के अनुसार,वर्तमान विश्व कि महाशक्ति अमेरिका,जो कि समस्त देशों से अधिक “पेट्रोलियम पदार्थ” का आयात करता,और विश्व में सबसे अधिक पेत्रिलियम पदार्थों का उपभोग भी अमेरिका में ही किया जाता है,और ये महाशक्ति अमेरिका,के पास अपने देश में इतने सुरक्षित पेट्रोलियम भण्डार हैं,कि वो अपनी आवश्यकता कि पूर्ति स्वं के उत्पादन से कर सकता है,इसके अलाबा अमेरिका के अन्दर इतने पेट्रोलियम विदोहन के संयत्र वर्तमान में स्थापित हैं,कि वो समस्त विश्व कि आवश्यकता कि पूर्ति अकेले कर सकता है………………..फिर क्यों अमेरिका अपने देश के खनिज तेल भंडारों को सुरक्षित रखते हुए,बिदेश से खनिज तेल आयात करने में,भारी धनराशी व्यय कर रहा है.खबर तो ये भी है कि विदेशों से आयातित कच्चा तेल अमेरिका अपने देश के सुरक्षित भंडारों भरकर अपने भण्डार अति सुरक्षित कर रहा है.क्योंकि किसी महाशक्ति को अपना भविष्य सुरक्षित रखने के लिए,प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण तो करना ही पड़ेगा.और अमेरिका आगामी भविष्य के प्रत्येक पहलु पर विचार करते हुए,सुरक्षित नियोजन कि निति अपना रहा है………………..एक बात और विचारणीय है,कि अमेरिका में धरती से तेल निकालने के इतने संयंत्र स्थापित हैं,कि वो जब चाहे,महज़ अपने इन संयत्रों के बूते समस्त विश्व कि कई वर्षों तक पेट्रोलियम आवश्यकताओं कि आपूति कर सकता है. हमारे देश कि ये बिडंवना रही है,कि कभी खोकला हमने अपनी माटी का मोल नहीं समझा,और विदेश के कचरे को भी मूल्यवान कीमती समझा,आज हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को वहुद्देशीय कंपनियों के हवाले करने में,अपना विकास और प्रगति देख रहे हैं,जो कि एक मारीचिका के अतिरिक्त कुछ नहीं…………………बल्कि इस निति से हम अपनी जड़ें ,अपनी धरती ,अपने देश को करने कि भूल कर रहे हैं.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

3 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ively के द्वारा
February 2, 2014

No quotisen this is the place to get this info, thanks y’all.

jalal के द्वारा
October 18, 2010

बहुत अच्छा प्रकाश डाला आपने इन इन संसाधनों को. इन को तो जैसे बर्बाद किया जा रहा है. वास्तव में झरिया की आग अभी तक नहीं बुझी है, अभी भी उसपर पानी का छिडकाव जारी है जबकि शायद दशकों पहले आग लगी थी. वहां आये दिन भूकंप के झटके आते रहते हैं. घरों में दरारें पड़ जाती हैं. अगर जल्द ही भारत अपने अन्दर ही संसाधनों का और उसके इस्तेमाल का सही तरीका नहीं निकलता है तो भी यह इसे और बीमार कर देगी. क्यूंकि हमारी आबादी संसाधनों का कम दुरूपयोग नहीं करती. आज भी सरकारी सेवाएँ हर जगहों पर बहुत ही कम है. अगर और हो जाएँ तो लोग अलग अलग गाड़ियों के बजे एक ही बस में जा सकते हैं. और भी बहुत से रास्ते है.

praveen sharma के द्वारा
October 18, 2010

आपके लेख में,एक ज्वलंत समस्या की ओर ध्यान लोगो का आकृष्ट कराया है,लेख अच्छा है,कुछ भाषाई अशुद्धियाँ सुधारने का प्रयत्न करें.


topic of the week



latest from jagran