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अरुधंति और शेखचिल्ली

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हमारे देश ने जब-जब किसी को अधिक सम्मान दिया है,तब-तब उसने भारत राष्ट्र से विश्वासघात करने का प्रयास किया है……………एक कहाबत/लोकोक्ति मैंने सुनी है,सही तो कही नहीं जा सकती पर है ज़ोरदार- “कि इस समाज में ईमानदार वो है,जैसे चोरी करने का अवसर नहीं मिला” सो अरुधंति जैसे लोग तब तक ईमानदार रहते है,या यूँ कहें देशभक्त हो सकते हैं———–जब तक उन्हें चोरी का मौका नहीं मिला———-जहां मौका मिला,ऐसे लोगों ने अस्मिता से खिलवाड़ करने में संकोच नहीं किया.


शेखचिल्लियों की एक कहानी मैंने सुनी है,झूठ या सच ये तो पता नहीं………………पर है बड़े मज़े की,विल्कुल अरुधंति राय जैसे रहे होंगे,कहानी किसी सुदूर एवं अति-पिछड़े इलाके के गाँव की है,उस गाँव में अभी विकास की हवा नहीं चली थी…..शायद दुर्गम इलाका रहा होगा………..मैंने सुना है ऐसे ही किसी गाँव में चोरी हो गयी,रात में…..चोर भी सब-कुछ माल उड़ा ले गए ……सो पुलिस आई हुई थी गाँव में,अगले दिन चोरी की जांच करने……..पुलिस महानिरीक्षक से लेकर,कोतवाल तक,हवलदार से लेकर जमादार तक……………..पर चोरों का कोई सुराग नहीं मिल रहा था…………..कोई सवूत छोड़ कर नहीं गए थे वे चोर……………..ज़रूर कलमाड़ी जैसे चालाक और चपल रहे होंगे.…………….सो पूरा थाना अपना सर खुजा-खुजा कर हार गया…………..तो फिर उस कोतवाल ने कहा,कि है कोई आदमी इस भीड़ में,या यहाँ का निवासी,जो चोरों का कुछ अत-पता बता सके?………….हमारा तो पूरा स्टाफ नहीं खोज सका………….यदि आपमें से हो कोई महान विद्वान,जो बता सके चोरों के विषय में कुछ सुराग………….तो हमें बताये,हम बहुत इनाम देंगे……


तब गाँव वालों ने कुछ देर आपस में काना-फूसी करके,पुलिस को बताया……………कि हम में से तो कोई चोरों को न तो जानता है,नाही कोई सुराग लगाने में सक्षम है…………………….पर हमारे गाँव में एक विद्वान आदमी रहता……………...नाम है उसका शेखचिल्ली……..बड़े कमाल का आदमी है,बहुत जानकार…………बहुत ही ज्ञानी…..…..हमारी जब भी कोई ऐसी समस्या आती है,जिसका हल हम नहीं खोज पाते………..तो वोही विद्वान शेखचिल्ली हमारी समस्या कल हल बताता है…………..बड़ा महान ज्ञान और पांडित्य पुरोधा है……………इस इलाके का सबसे जानकार आदमी है. एक बार रात में एक हाथी हमारे गाँव से निकलकर चला गया था,अँधेरे में किसी ने देखा भी नहीं……….और पहले भी हमारे गाँव के किसी आदमी ने कभी हाथी नहीं देखा था……………….सुबह जब धुल में हाथी के पाँव के निशान हमने देखे,तो सब घबरा गए……………..जाने कौन पिशाच…या दैत्य हमारे गाँव में आया था…………कोई नहीं बता पाया था,कि ये निशान किस चीज़ के हैं. तब इसी शेखचिल्ली ने हमें बताया था,……तत्काल बता दिया था उसने,बस चुटकी भर में………...”कि हो न हो,बाँध पैर में चकिया,ज़रूर कोई हिरणा कूदा होय”…………………..उसे ने हमें बताया था,कि अपने पैरों में चक्की बाँध कर,रात में ज़रूर कोई हिरण हमारे गाँव में कूदा होगा” उसी चक्की के निशान हैं धूल पर…………..इसी ने हमें बताया था,बड़ा जानकार है…..सो चोरों के बारे में बस वोही कोई सुराग बता सकता है.बता क्या सकता है…………


ये मानो बता ही देगा,चोरों के वारे में,विल्कुल सटीक. सो पुलिस महानिरीक्षक ने उस शेख चिल्ली को बुलवाया,और पूछा……कि मुझे पता लगा है,कि तुम बहुत जानकार और ज्ञानी हो….तो हमारी समस्या का हल भी बता दो…..सुवह से पूरा थाना और पूरा विभाग हलकान है…….भाई कुछ मदद करो हमारी……………..ये सुनकर शेखचिल्ली ने कहा,मई जानता हूँ कि चोरी किसने कि है……………….मै आपको बता सकता हूँ……..विल्कुल तक्षण ……अभी के अभी बता सकता हूँ………….सब बड़े हैरान हुए,और खुश भी…………..कि ये तो बड़ा ज्ञानी है,जितना सुना है उससे भी ज्यादा……………कमाल का आदमी है……………सो कोतवाल ने शेखचिल्ली से पूछा बताओ,किसने कि है ये चोरी. शेखचिल्ली बोला,ऐसे यहाँ पर आपको नहीं बता सकता …………इसमें मेरी जान का खतरा है………….विल्कुल गोपनीय तरीके से वताऊंगा…………विल्कुल एकांत में……अकेले में……जहां दूर-दूर तक कोई हमारी बात न सुन सके…………..बस मै कहूँ-और तुम सुनो……..बस एक पर एक हो………………..सो गाँव से दूर जंगल में चलो,वहां बताऊंगा,किसने की है ये चोरी. कोतवाल शेखचिल्ली की बात मानकर उसके साथ गाँव से दूर जाने लगा………….जब काफी दूर आ गए,तो कोतवाल ने कहाँ,अब यहाँ कोई नहीं है…………तुम अब बताओ चोरी किसने की है…………शेखचिल्ली बोला यहाँ नहीं,अभी और दूर चलो,यहाँ गाँव अभी नज़दीक है,कोई सुन सकता है……….सो कोतवाल शेखचिल्ली के साथ चलता रहा,जब तक की शेख चिल्ली खुद नहीं रुक गया……………रुक जाने के वाद,कोतवाल ने कहा…..अब बताओ किसने कि है ये चोरी ?………………


शेखचिल्ली ने कहा ऐसे खुले में नहीं बता सकता………..अपना कान मेरे करीब लाओ,धीरे से………..हौले से…….चुपके से ……….ये राज़ मै आपके कान में बताऊंगा………….क्योंकि अगर किसी ने सुन लिया तो गज़ब हो जाएगा. मजबूरन अपना कान शेखचिल्ली के मुंह के करीब लाया……………..तब शेखचिल्ली ने बड़े धीरे से………….फुसफुसाते हुए बताया….कि हो न हो…………………..ये चोरी जिसने भी की बहुत ही चालाक रहा होगा…..सो ज़रूर ये चोरी किसी चोर ने ही की है……मै दावे से कहता हूँ,कि किसी चोर ने ही कि है ये चोरी…………………


और विल्कुल उसी शेखचिल्ली के समान अरुधंति राय,और गिलानी..…………खुद को महाज्ञानी दर्शाने के लिए ……………ये कतिपय वयान देकर तमगा हासिल करना चाहते है……………………..कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग कभी नहीं रहा है,……………..अरुधंति जी थोडा बहुत साहित्य लिख लेने से…………या एक बुकर पुरस्कार पा लेने से …………हर क्षेत्र में प्रकांड पांडित्य नहीं हो जाता……………….आप साहित्यकार हैं,…………साहित्यकार ही रहिये…………..”ऐसा लगता है,अरुधंति जी को या तो हमारे देश में औकात से अधिक सम्मान मिला है,……ये उन्हें इज्ज़त रास नहीं आ रही है………………ज़रा सी प्रसिद्धि मिली नहीं,कि आसमान में उड़ने लगे……………….अरुधंति जी जब दूसरों के पंखों के सहारे , आसमान से कोई ज़मीन पर गिरता है……….तो मात्र शरीर बचता,प्राण रास्ता में ही खर्च हो जाते है.


और रही बात हमारे देश के कुछ विचारकों,और राष्ट्रीय नेताओं कि ………………तो पूर्व प्रधानमन्त्री से जुदा एक किस्सा याद आता है………..सच-या-झूठ इसका तो अनुमान नहीं………….वैसे मुझे तो सच जैसा ही लगता है…………….जिस प्रकार ऊल-जलूल हरकतें हमारे राष्ट्रीय नेता करते हैं और उनकी मानसिकता है ……….उससे तो लगता है,ये सत्य ही होगा . ८० के दशक से पूर्व कि घटना है,जब “देश में जनता पार्टी” कि सरकार गिरी ही थी,जनता पार्टी ने अपने इस शासन काल में “केकड़ों कि भांति कार्य शैली” का बड़- चड़कर प्रदर्शन करते हुए,मात्र चंद दिनों में देश को कई प्रधानमन्त्री (श्री चौधरी चरण सिंह,श्री गुलजारी लाल नंदा,श्री मोरारजी देसाई आदि) दिए,ये लोग बस प्रधानमन्त्री ही बदलते रहे,शासन भली प्रकार चलाने कि फुर्सत ही नहीं मिली–———ये ही वो दौर था,जब डीजल और मिटटी के तेल पर कोटा प्रणाली लागू हुई……….अर्थात टोकन से तेल मिलता था————-कुछ लोगों को तो सर पर चुपद लेने भर डीजल भी नहीं मिल पाया इस दौरान………………...इनके ही शासन-काल में प्लास्टिक के पुराने जुटे-चप्पलों से बराबर भाव में चीनी बिकी थी………….यहाँ तक कि चीनी गाँव में रस्सियों से (वस्तु के बदले वस्तु-विक्रय प्रणाली) बदले में भी बिकी थी………… तो बात इसके बाद कांग्रेस के शासन काल के दौरान “देश में आसाम समस्या ज्वलंत” मुद्दा थी,हांलाकि जनता पार्टी के शासन काल में भी ये मुद्दा उतना ही ज्वलंत था,पर उन्हें प्रधानमन्त्री बदलने से फुर्सत ही नहीं मिली,जो कुछ देखते. …………………..सो इस समस्या का समाधान खोजे जाने की चर्चाएँ जोरों पर थीं,जैसे आजकल की कश्मीर समस्या…………….


सो एक दिन “श्री मोरारजी देसाई ने वक्तव्य दे डाला————–की आसाम समस्या का हल उनके पास है,वे इस समस्या को सहज ही सुलझाने का नुस्खा जानते हैं,मगर……………(ये वोही मगर/लेकिन शव्द है,जिसके प्रयोग किये जाने पर,उसके पीछे कही साड़ी बात स्वत: असत्य…झूठी हो जाती है) सो मोरारजी जी ने कहा—————-अगर भारत के राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैल सिंह,उनसे (यानी मोरारजी देसाई से) कहें तो वे आसाम समस्या का हल,चुटकियों में कर देंगे..……………………..अरे भाई जब तुम्हारा शासन काल था,तब समस्या हल क्यों नहीं की…………नुस्खा तो तुम्हारे पास था…………तब क्या करते रहे..……उनसे पूछा जा सकता था…………..सो काफी दिनों तक,वो ऐसे ही वयां देते रहे……………चर्चा चली…….बात ज्ञानी जैल सिंह जी तक पहुंची……………………….सो उन्होंने वक्तव्य देते हुए,अनुरोध किया———–कि देसाई जी यदि समाधान जानते हैं,तो सुलझा दें…………………..अब बात जब मोरारजी देसाई तक पत्रकारों ने पहुंचाई,और कहा आप बताइये,आसाम समस्या का हल,राष्ट्रपति जी ने आपसे अनुरोध किया है,………..सम्पूर्ण भारत को आपसे बहुत आशा है……………तब मोरारजी देसाई ने कहा,ऐसे मई सड़क छाप थोड़े ही हूँ,कि जाऊं और समाधान कर दूँ……………………सरकार मुझे निमंत्रण पात्र भेजे,तब जाऊँगा समाधान बताने दिल्ली……………………सो कुछ ही दिन में निमंत्रण पात्र भी भारत सरकार से मोरारजी जी के पास आ गया………………………..अब पत्रकार फिर मोरारजी जी से पूछने लगे……………..जाइए,अब तो समाधान,बता दीजिये……………………..अब बात फंसती नज़र आई,क्या जवाब दें…………. सो कहने लगे ऐसे क्या ख़ाक जाऊं……..पहले मुझे,रेल के आने-जाने का टिकट तो भेजें,राष्ट्रपति जी..……………………..


ऐसा है हमारे देश का बुद्धिजीबी वर्ग आजकल हमने देखा कि जब किसी को उसके काम से ज्यादा प्रसिद्धि मिल जाती है,तो कुछ कमज़र्फ शख्सियतें उसे वर्दाश्त नहीं कर पातीं,………………और स्वयं को भाग्यविधाता…..या स्रष्टा समझने लगते है…………….अरुधंति और गिलानी ने मात्र एक वयान नहीं,बल्कि अपने देश……..अपनी माटी……….अपनी जननी…………....अपने राष्ट्र की गरिमा और प्रतिष्ठा का संहार करने का प्रयास किया है. किसी अरुधंति या गिलानी के कह देने मात्र से कश्मीर से अलग नहीं जाएगा……..और कश्मीर भारत का अंग है,………….और रहेगा………………जो लोग को कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते है………………वो भी जाने-अनजाने में अरुधंति और गिलानी के विचारों(या यूँ कहें कि कुत्सित विचारों/कुविचारों) को ही हवा दे रहे हैं.…………..कश्मीर भारत का अंग है,न कि अभिन्न अंग……….मात्र अभिन्न शव्द जुड़ जाने से ही…………..इसमें संदेह पैदा हो जाता है…………..अभिन्न का सामान्य अर्थ है…………जिसे मूल इकाई से अलग न किया जा सके…………अर्थात उसकी अलग होने कि संभावनाएं हैं……यानी उसे कभी भी अलग किया जा सकता है…………हांलाकि वर्तमान में उसे ऐसे जोड़ा गया है कि ऐसी अवस्था में उसे किया जाना संभव नहीं है………..उसे जोड़ा गया है………..एक जोड़ है,दो इकाइयों का…जिसे एल्फी से…..या फेवी क्विक से……..या अरेल्डाईट से….किसी अन्य माध्यम से………….ऐसा जोड़ दिया गया है,जो वर्तमान दशाओं में अलग नहीं किया जा सकता…..एक तरह से बैल्डिंग कर दिया गया……जो कभी भी अलग परिस्थितियाँ आने पर अलग हो सकता है………….जहां जोड़ लगाया जाता है,वो टूटता ज़रूर है,अलग ज़रूर हो जाता है…..कभी न कभी…………..क्यों अभिन्न का अर्थ जो मूल्य से अलग न हो..….जो लोग कश्मीर सन्दर्भ में अभिन्न शव्द का इस्तेमाल कटे हैं,वो कहीं न कहीं अलगावबाद को ही हबा दे रहे है………………..अर्थात वो ये मान रहे हैं,कि कश्मीर भारत से जोड़ा गया अंग है,जो अब अलग नहीं हो सकता. हम ऐसे विचारों के स्थान पर उन विचारों को ज्यादा सार्थक,और सत्य मानते हैं,जिनमें कश्मीर को भारत का अंग माना जाता हो,न कि अभिन्न अंग…………क्योंकि मात्र एक छोटे से शव्द ने संशय पैदा कर दिया………भ्रम उत्पन्न कर दिया…………..संदेह कि संभावना पैदा कर दी…….


अत: कश्मीर सन्दर्भ में येही कहा जाना उचित व् उपयुक्त है कि “कश्मीर भारत का अंग है………..ठीक वैसे ही जैसे अन्य प्रदेश…..उत्तर प्रदेश,मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,आंध्रप्रदेश,तमिलनाडु ………….आदि…………सब भारत भूमि का हिस्सा हैं..……………………………….और मै तो यहाँ तक भी कहना चाहूँगा (हांलाकि मेरी बात पक्ष विशेष को बुरी लग सकती है,जिसके लिए मैं क्षमा याची हूँ) कि हमने महाराष्ट्र का नाम भी,जाने-अनजाने में गलत या यूँ कहें कि त्रुटिपूर्ण रख दिया है……………जो कभी आने वाले समय में,केन्द्रीय नेतृत्व के समक्ष समस्या पैदा कर सकता है,कारण भारत कैसा राष्ट्र है,जो राष्ट्र के अन्दर “महाराष्ट्र” है,देश के अन्दर “महादेश” ये कैसा संयोग...…………….ये कैसा विरोधाभास…………कहीं न कहीं ये शव्द भी अलगावबाद को हवा दे सकता है……………..भाषा और विचारों के मर्म को समझें.

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12 प्रतिक्रिया

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Anne के द्वारा
February 2, 2014

That’s a smart way of loiknog at the world.

kmmishra के द्वारा
October 29, 2010

प्रिय मलिक साहब, सादर वंदेमातरम ! सबसे पहले तो आपसे अनुरोध करूंगा कि हमारी इस वार्ता से बहुत टेंस होने की जरूरत नहीं है । वार्ता का आनंद लीजिये और थोड़ा मुस्कुराईये । आपने कहा – . “रही बात राष्ट्र प्रेम और देशभक्ति कीएतो स्वम को ? एक पूर्ण भारतीय नागरिक और देशप्रेमी? मानता हैं, रही बात की की राष्ट्र भावनाओं को ठेस पहुंचाने की तो ऐसा सपने में भी कभी विचार नहीं किया हमने.हम भारत के प्रत्येक नागरिक से ये आशा रखता हूँएकि वो अपने देशध्राष्ट्र के प्रति अपने प्रेमएवात्सल्य समर्पित करे सदैव देश के लिए जिए और जब मृत्यु का क्षण आये तो देश के लिए हंसकर ख़ुशी से न्योछावर हो जाये” . मैं आपकी इन बातों की कद्र करता हूं । हम सब के लिये राष्ट्रधर्म सबसे पहले है और जब देश की पुकार हो अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देना चाहिये । आज इसी सोच की सबसे ज्यादा जरूरत है । . आपने कहा है -हमारा कहना है कि जो शव्द भ्रम या संदेह उत्पन्न करे, उसको प्रयोग में लाने कि आवश्यकता क्या है, हम भारतीय जाने क्यों, हर चीज़, हर बात में श्रृंगार करना चाहते हैं, जाने कौन सी आदत है हमारी . मलिक साहब ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ कोई श्रंगार का शब्द नहीं है । यह एक संवैधानिक शब्द है । जम्मू कश्मीर के संविधान में अभिन्न शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है । यह दुनिया को बताने के लिये है कि चाहे पूरी कायनात एक तरफ हो जाये कश्मीर हमारा है और आगे भी रहेगा । . अभी कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में एक विवादस्पद बयान दिया था कि भारत में कश्मीर का पूर्ण विलय नहीं हुआ है । उनके कहने का भी यही अर्थ था कि भारत वालों कान खोल कर सुन लो कश्मीर भारत का सिर्फ अंग है और हम इस अंग को इतना सड़ा देंगे कि तुमको अंत में इस अंग को ऑपरेट करके निकालना पड़ेगा । तब उनको पूरे भारत ने उठ कर कहा था कि मुख्यमंत्री साहब आप पहले जम्मू कश्मीर का संविधान पढ़ लें । सबसे पहले तो वहीं लिखा है कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । . आपने कहा कि जो शब्द संदेह या भ्रम पैदा करे उसे प्रयोग में लाने की क्या जरूरत है । मलिक साहब आज पहली बार किसी के मुंह से सुन रहा हूं कि अभिन्न शब्द से संदेह और भ्रम पैदा होता है । अभिन्न शब्द का प्रयोग तो भारत की संसद ने जम्मू कश्मीर के लिये सैंकड़ों बार किया है । आज तक यह तर्क मैंने न कहीं पढ़ा और न ही किसी विद्वान के मुंह से सुना । इसके विपरीत अभी हाल ही में पाक संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया कि भारत सरकार जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग न कहा करे । . आज आप कह रहे हैं कि अभिन्न शब्द का इस्तेमाल मत करो कल कोई और साहब आकर कहेंगे कि अंग शब्द का भी इस्तेमाल मत करो । . सिर्फ इसलिये कि अभिन्न शब्द से गिलानियों और अरूंधती रायों को बढ़ावा मिलता है हम इस संवैधानिक शब्द का इस्तेमाल करना बंद करदें, एक कमजोर दलील है । क्या आज हम इन दो कौड़ी के देशद्रोहियों के इतने मोहताज हो गये हैं कि कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहना बंद कर दें । सारा कसूर केन्द्र सरकार की नपुंसकता का है । जब वह सम्मेलन हो रहा था तभी उठा कर तिहाड़ में डाल देना था सभी को और देशद्रोह का मुकद्दमा रजिस्टर करना था । आईबीएन 7 के महान पत्रकार आशुतोष कह रहे थे कि अरूंधती राय बड़ी हस्ती हैं, दुनिया में तहलका मच जायेगा, ये हो जायेगा, वो हो जायेगा । अब अपने देश में ला एण्ड आर्डर मेनटेन करने के लिये भी क्या हमें विदेशी एजेंसियों का मुंह ताकना पड़ेगा । यह हमारा अंदरूनी मामला है, किसी का कोयी हक नहीं कि वो हमारे अंदरूनी मामले में दखल दे । देश की सम्प्रभुता भी कोयी चीज होती है या सिर्फ वो कहने और पढ़ने के लिये ही संविधान की प्रस्तावना में रखी गयी है । . मुझे जान कर बड़ी खुशी हुयी कि आप कभी न कभी इलाहाबाद उच्च न्यायालय तशरीफ लाये हैं । पर लगता है कि आप वकीलों की भीड़ और वह आलीशान इमारत देख कर ही चले गये । आपने माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तुलना एक भीड़भाड़ वाले रेलवे प्लेटफॉर्म से कर दी । अगर आपको भारत की न्यायपलिका के 150 साल पुराने आधार स्तंभ और एशिया की सबसे बड़ी उच्च न्यायालय की महत्ता और गौरव की जानकारी होती तो आप यह तुलना कभी न करते । माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय का भारत देश की न्यायपलिका में क्या स्थान है इस पर कई खंड में हजारों पेज की किताब लिखी जा सकती है । आपको सिर्फ इतना याद दिलाना चाहूंगा कि जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत के लोकतंत्र को बंधक बना लिया था तब यह इलाहाबाद उच्च न्यायालय थी जिसने श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ निर्णय दिया था । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने देश को क्या दिया है यह समझने के पहले उसे रेलवे स्टेशन मानने की सोच छोड़नी होगी । . वैसे मैं आपकी जिद को सलाम करता हूं कि मेरे इतने तर्क देने के बावजूद भी आप देश के इकलौते विद्वान हैं जो कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नहीं मानते हैं । आपको आपकी जिद मुबारक । जय हिंद ।

saima malik के द्वारा
October 29, 2010

परम प्रिय विद्दान अधिवक्ता,श्री मिश्र जी,माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद को सादर नमस्कार- आप विद्वान अधिवक्ता हैं,वो भी माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद में—–ये गौरव कि बात है———–और आपके कमेंट्स और लेखों से लगता है कि आपकी विषय पर पकड़ भी अच्छी है—–और प्रस्तुति भी———–बस एक ही कमी अखरती है——–दुसरे के विचार समझने,उनका गहन एवं सूक्षम अवलोकन कर भाव समझने के स्थान पर——अपनी बात कहने की तीर्व उत्कंठा—–और पूर्वाभास—पूर्व परिकल्पनात्मक विचार. मेरे कहने के तात्पर्य पर पुन: विचार करें—— \"जो लोग कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते हैं———वे लोग कहीं—न–कहीं गिलानी और अरुधंति के विचारों को ही हवा दे रहें हैं\"………..मैंने ये नहीं कहा के वे भी अरुधंति और गिलानी की तरह देश द्रोह सद्रश्य कार्य कर रहे है,या देश द्रोही है…………..हमारा कहना है,कि जो शव्द भ्रम या संदेह उत्पन्न करे…………उसको प्रयोग में लाने कि आवश्यकता क्या है…………..जबकि उससे श्रेष्ठ और समानार्थी शव्द पहले ही प्रयोग में है…………..हम भारतीय जाने क्यों——हर चीज़—–हर बात—–में श्रृंगार करना चाहते हैं——–जाने कौन सी आदत है हमारी——–वस् शव्दों से श्रृंगार करते हैं——अरे श्रृंगार करना है तो अपने विचारों से करो——-अभिव्यक्ति से करो—–अपने कार्य और व्यवहार से करो—– हम ये क्या करते रहते है———–राष्ट्र के अन्दर महाराष्ट्र———-देव के साथ महादेव——-श्री के साथ-साथ सर्व श्री———–और हद तो तव है,जव हम कुछ यूँ करते हैं——–श्री….श्री….श्री…..सर्व श्री…….भगवान्…..महादेव…..श्री….श्री…१००८….\"अमुक\" महाराज…………या \"श्री…श्री…श्री …१००१…\"श्री अमुक पांच को सरकार ……ये क्या है…..क्या मात्र श्री या भगवान् से काम नहीं चलेगा यदि हमें अभिन्न शव्द का प्रयोग ही करना है….उसके बिना हमारा भोजन हजम नहीं होता हो तो…..ऐसा भी कह सकते हैं कि \"पाक अधिकृत कश्मीर \"जिसे पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है \"पाक अधकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और कश्मीर भारत का अंग है \" रही बात भारत के संविधान की,तो उसमें किसी भी स्तर पर कोई भाषाई त्रुटी नहीं है,संविधान में वर्णित प्रत्येक शव्द चुन-चुन कर लिखा गया है,इसलिए ही हमें संविधान की भाषा के अधिकाँश शव्द समझ ही नहीं आ पाते……और कुछ शव्द पहले भी,चर्चा का विषय बने है…..और जिनकी विशेष संविधानिक व्याख्या भी समय-समय पर संवंधित वादों में की गयी है…………….उदाहरण स्वरुप- संविधान की प्रस्तावना में \"विशेष संविधान संशोधन \"प्रक्रिया द्वारा शव्दों का जोड़ा और हटाया जाना………….चर्चित वाद,केशवानंद भारती वनाम…… ,मिनर्वा मिल वनाम…… ,आदि में माननीय न्यायालय द्वारा शव्दों की पुर्व्याख्या……\".संभिदान के मुलभूत ढांचा \" की व्याख्या आदि पर मात्र इलाहाबाद में,माननीय उच्च न्यायालय में अधिवक्ता होने मात्र से,कोई संविधान का पारंगत नहीं हो जाता————–हमने देखा है,इलाहाबाद उच्च न्यायालय परिसर में अधिवक्ताओं जमघट,वो सेंट्रल वार लाइब्रेरी वरामदाह (vaaraamdaah) उत्तरी और दक्षिणी,सेंट्रल हाल—–बिल्डिंग के वाहर खुले लान में,वो लैव्रेरी कैंटीन कि भीड़ और उमस————-सचमुच अलग अनुभव——लगता है मानो पूरा देश माननीय अधिवक्ता हो गया——-जहां याचिका करता कम ही दिखाई देते है,और मान्न्नीय अधिवक्ता असंख्य…………सचमुच एक अलग ही अनुभव—–एक अलग रोमांच——-भीड़ में न कोई बड़ा ———-न कोई छोटा——सब एक से——सब कि एक सामान मेजें——-एक सामान कुर्सियां—–और बैठने का एक सामान स्थान————–हमें दो-तीन स्थान ही देश में विल्कुल एक से लगते हैं————–मुंबई का क्षत्रपति शिवाजी रेलवे टर्मिनल——-कुर्ला/बांद्र/चर्चगेट जंक्शन. सर्वप्रथम मेरे किसी भी वक्तव्य/वाक्यांश का अर्थ अन्यथा न लें—-सीधे और स्पष्ट भाव को समझे—–मै वाकपटुता (jugglary of words) का समर्थक हूँ——सादा सोचता हूँ—–सादा बोलता हूँ——और स्तरीय सोच रखता हूँ. रही बात राष्ट्र प्रेम और देशभक्ति की,तो स्वम को \" एक पूर्ण भारतीय नागरिक और देशप्रेमी\" मानता हैं,रही बात की की राष्ट्र भावनाओं को ठेस पहुंचाने की——–तो ऐसा सपने में भी कभी विचार नहीं किया हमने——-हम भारत के प्रत्येक नागरिक से ये आशा रखता हूँ,कि वो अपने देश/राष्ट्र के प्रति अपने प्रेम,वात्सल्य,समर्पित करे,सदैव देश के लिए जिए—–और जब मृत्यु का क्षण आये तो देश के लिए हंसकर–ख़ुशी से न्योछावर हो जाये.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 28, 2010

हल्के फ़ेर के कारण आप और श्रद्धेय मिश्रा जी के बीच हुई बहस सबके लिये लाभदायक है । देखूं मेरी यह टिप्पणी आप पर पोस्ट होती है या नहीं । आज तक तो कम ही हुई है । साधुवाद ।

kmmishra के द्वारा
October 28, 2010

मलिक साहब सादर वंदेमातरम ! मैं माननीय इलाहबाद उच्च न्यायालय का एक अदना सा अधिवक्ता हूं । मुझमें एक भारी कमी है । जब भी मुझे यह लगता है कि कोई बात राष्ट्रहित के खिलाफ जा रही है मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता हूं । . आप का यह लेख तारीफ के काबिल है । बस आपकी एक बात पर मुझे घोर आपत्ति है । आपने कहा कि कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहने वाले भी सैयद अली शाह गिलानी और अरूंधती राय की मानसिकता रखते हैं । आपको नहीं लगता कि आपने देशद्रोहियों और देशप्रेमियों को एक ही तराजू में तौल दिया । . मैंने अपनी बात के समर्थन में तमाम उन लोगों के कथन उद्धरित किये हैं जो भारत की केन्द्रीय सरकार चलाते हैं । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, विदेश मंत्री एस एम कृष्ण (जिन्होंने अभी संयुक्त राष्ट्रमहासभा में जोर देकर कहा है कि संयुक्त राष्ट्र की 65वीं महासभा में अपने संबोधन में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कृष्णा ने कहा कि जम्मू और कश्मीरए जो भारत का अभिन्न अंग हैए पाकिस्तान प्रायोजित उग्रवाद और आतंकवाद के निशाने पर है। ),महाराजा हरिसिंह के विद्वान पुत्र श्री कर्ण सिंह जी, खुद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के वालिद और केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री फारुक अब्दुल्ला । पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी । यहां तक कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी;सीपीआई.एमद्ध के महासचिव प्रकाश करात ने भी अभिन्न अंग शब्द का प्रयोग किया है । और तो और भारत की संसद भी इस वाक्य को सैंकड़ों बार दोहरा चुकी है और वह भी तब जब संसद में लालबहादुर शास्त्री, पटेल आदि देशभक्त चुन कर आया करते थे । . आपने कहा कि आम नेता भारत के संविधान और भारतीय दंड संहिता में अंतर नहीं समझता है । मैं विनम्र निवेदन करूंगा कि ऊपर गिनाये गये सभी लोग विधि के अच्छे जानकार हैं, कोयी अंगूठा छाप अपराधी सांसद नहीं । . आपने कहा कि भारत का संविधान कश्मीर को अभिन्न अंग नहीं कहता है । . नीचे में फिर कुछ पंक्तियां डाल रहा हूं जो कि कश्मीर के संवैधानिक पक्ष को ही प्रस्तुत कर रही हैं । इसमें जम्मू कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 3 के साथ साथ कश्मीर संबन्धी भारत के संविधान संशोधन की भी जानकारी है । मैं मानता हूं कि मेरे द्वारा कही गयी सत्य बातें कड़वी होंती हैं । ————————————————————————————– 1994 में भारतीय संसद के दोनों सदनों द्वारा जम्मू-कश्मीर पर पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव को यहां स्मरण करना समीचीन होगा, जिसमें दृढ़तापूर्वक कहा गया है: . ”जम्मू एवं कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग रहा है, और रहेगा तथा शेष भारत से इसे अलग करने के लिए किसी भी प्रयासों का सभी आवश्यक साधनों से प्रतिरोध किया जाएगा।” . यही प्रस्ताव आगे कहता है: ”पाकिस्तान को भारत राज्य के जम्मू एवं कश्मीर का क्षेत्र खाली करना चाहिए जिसे उसने बलात हथिया रखा है।” . बहुतों को यह नहीं पता होगा कि धारा 370 के कारण जम्मू एवं कश्मीर राज्य के पृथक संविधान की धारा 3 इस तरह है: . राज्य का भारत संघ के साथ सम्बन्ध- जम्मू एवं कश्मीर भारत संघ का अभिन्न अंग है और रहेगा। . भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.एस. आनन्द ने अपनी पुस्तक द कांस्टीटयूशन ऑफ जम्मू एण्ड कश्मीर में उपरोक्त भाग पर निम्न टिप्पणी की है। . 1951 में राज्य संविधान सभा आहूत की गई थी ताकि वह ”राज्य के जुड़ने के सम्बन्ध में अपने तर्कसंगत निष्कर्ष” दे सके। संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर सम्बन्धी विवाद पर ठहराव आ चुका था। राज्य के भविष्य के बारे में अनिश्चितता समाप्त करने के उद्देश्य से कश्मीर में असेम्बली ने पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद 1954 में राज्य के भारत में विलय की पुष्टि की। . 1956 में, जब राज्य संविधान की ड्राफ्टिग को अंतिम रुप दिया जा रहा था, तक राज्य संविधान में राज्य के विलय को एक ‘स्थायी प्रावधान‘ मानने के सम्बन्ध में राज्य की अंतत: स्थिति को शामिल करना जरुरी समझा गया। यही वह विचार था जो संविधान के भाग 3 के रुप में अपनाया गया। . इस भाग में शब्द प्रयोग में लाए गए ”हैं-और रहेगा” । इससे साफ होता है कि राज्य के लोगों के मन में भारत के साथ जुड़ने के बारे में कभी कोई शक नहीं था। यह भाग मात्र उनकी इच्छा कि ”भारत संघ के अभिन्न अंग” बने रहने की पुष्टि भर है। . सन् १९५६ में भारत सरकार ने संविधान में सातवां संशोधन कर जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग बना लिया था। नेशनल कान्फ्रेंस की कुटिल मंशा इसे निरस्त कराने की है। इसके समाप्त होते ही राष्ट्रपति के सभी अध्यादेश, संवैधानिक संशोधन, संसद के अधिकार और सर्वोज्च न्यायालय का नियंत्रण स्वयमेव समाप्त हो जाएंगे। . कश्मीर के संविधान में भी कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया गया है. इस सविधान की पुष्टि कशमीर विधासभा अपनी पहली बैठक में ही कर चुकी है. . कशमीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने बिना शर्त इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ ऐक्सेसन यानि सामिलन पत्र पर दस्तखत किये थे. उसकी माउनटबेटेन ने तत्काल पुष्टि करा दी थी. भारत की संसद कश्मीर को अभिन्न अंग बताते हुए और पाकिस्तान के कब्जे के कश्मीर के हिस्से को वापस लेने का प्रस्ताव १९५४ में और उसके बाद भी कर चुकी है. सन 1819 में महाराजा रंजीत सिंह ने अफगानी सेना को परास्त कर कश्मीर को एक बार पुनः भारतीय जीवनधारा में सम्मिलित किया। कालांतर में अंग्रेज शासन की समाप्ति के बाद तत्कालिन सभी रियासतों एवं रजवाड़ों के समक्ष भारत के साथ विलय का प्रस्ताव रखा गया। कश्मीर के तत्कालिन शासक महाराजा हरि सिंह ने 27 अक्टूबर 1947 को विलयपत्रक पर हस्ताक्षर करके जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग घोषित किया। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ। जिसके धारा 1 में जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग और स्थायी इकाई घोषित किया गया। 6 फरवरी 1956 को जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने जम्मू कश्मीर का भारत के साथ विलय को पूर्ण सहमति दी। जम्म कश्मीर की संविधान के धारा 3 में लिखा है ‘‘जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा’’। और धारा 4 के मुताबिक राज्य की सीमा के अंतर्गत वे सभी क्षेत्र आएंगे जो 15 अगस्त 1947 को जम्मू-कश्मीर राज्य के अंतर्गत थे। इसका तात्पर्य यही है कि पाकिस्तान के अनाधिकृत कब्जे में जो भूभाग है वह भारत का ही अंग है। ————————————————————————————————- The Constitution of Jammu and Kashmir, 1956 Legal Document No 140 . We, the people of the State of Jammu and Kashmir, having solemnly resolved, in pursuance of accession of this State to India which took place on the twenty-sixth day of October, 1947, to further define the existing relationship of the State with the Union of India as an integral part thereof, and to secure to ourselves. JUSTICE, social, economic and political; LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship; EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among us all; FRATERNITY, assuring the dignity of the individual and the unity of the Nation; IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY This seventeenth day of November, 1956 do Hereby Adopt Enact and Give to ourselves this constitution. PART I PRELIMINARY 1. (1) this Constitution may be called the Constitution of Jammu and Kashmir. (2) This section and sections 2,3,4,5,6,7,8, and 158 shall come into force et once and the remaining provisions of this constitution shall come into force on the twenty-sixth day of January, 1957, which day is referred to in this Constitution as the commencement of this Constitution. 2. (I) In this Constitution, unless the context other-wise requires. (a) \"Constitution of India\" means the Constitu-tion of India as applicable in relation to this State. (b) \"existing law\" means any law, ordinance, order bye-law, rule notification; or regulation based, made or issued before the commence-ment of this Constitution by the Legislature or other competent authority or person hav-ing power to pass. make or issue such law, ordinance, order bye-law rule, notification or regulation; (c) \"Part\" means a part of this Constitution; (d) \"Schedule\" means a schedule to this Constitution; and (e) \"taxation\" includes the imposition of any tax or impost, whether general or local or special, and \"tax\" shall be construed accordingly. (2) Any reference in this Constitution to Acts or laws of the State Legislature shall be construed as in-cluding a reference to an Ordianance made by the Sadar-i-Riyasat. PART II THE STATE (3) The State of Jammu and Kashmir is and shall be an integral part of the Union of India. —————————————————————————- आपके लेख की इन पंक्तियों से – (जो लोग को कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते है…..वो भी जाने.अनजाने में अरुधंति और गिलानी के विचारों;या यूँ कहें कि कुत्सित विचारोंध्कुविचारों को ही हवा दे रहे हैं) किसी भी देशभक्त को बुरा लग सकता है क्योंकि आप उनकी तुलना देश तोड़ने वालों से कर रहे हैं । सादर आपका के एम मिश्र

sdvajpayee के द्वारा
October 28, 2010

 ”हम क्यों कहते हैं,कश्मीर भारत का …;”  इस वैचारिक प्रखरता, राष्‍टी्य भाव प्रवणता और स्‍पष्‍टवादिता को नमन।

saima malik के द्वारा
October 28, 2010

परम आदार्णीय मिश्रा जी को संवोधित विंदुवार उत्तर- \"मेरे वाक्यांश पर सद्भावना पूर्वक मनन करें—–हम क्यों कहते हैं,कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है———क्या शरीर का कोई अंग शरीर से भिन्न हो सकता है—–मेरी नज़र में ऐसा असंभव है————हम संभावना पैदा कर देते हैं—–अंग के शरीर से भिन्न होने कि—–हम मान रहे हैं—–कोई अंग शरीर से भिन्न भी हो सकता है—–ये संभावना है,हम संशय पैदा कर रहे है——————-शरीर का अंग है तो है——भिन्न या अभिन्न से क्या मतलव——–शरीर का अंग है—–तो शरीर से भिन्न हो ही नहीं सकता——-भिन्न करोगे तो न तो अंग रहेगा——और संभावना शरीर खो जाने कि भी हो सकती है\" \"मेरी दृष्टि में हमें कहना चाहिय——\"कश्मीर तो हमारा (हमारे देश का/भारत का) अंग है ही————करांची तक हमारा दावा है————हमें कश्मीर ही नहीं,कराची तक चाहिए\" प्रिय मिश्रा जी,हमें ये बताने की कृपा करें,कि \"भारत के संविधान\" में,किस अनुसूची में,किस अनुच्छेद के अंतर्गत \"कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग\" बताया गया है,कृपया संविधान में वर्णित मूल्य \"वाक्यांश सन्दर्भ\" से मै ही नहीं,और अन्य लोग भी लाफ उठा सकें. दूसरी बात आपके लेख पर हमारे द्वारा छदम टिप्पड़ी लिखना———तो श्रीमान ये विचार आप सदा के लिए ,अपने मन-मस्तिष्क से निकाल दें–कि हमने नाम बदलकर आपके लेख पर टिप्पड़ी कि——————-और याद रखें———जब भी हमें टिप्पड़ी लिखना होगी…..छद्मीकरण द्वारा नहीं,वल्कि स्पष्ट होगी——–विल्कुल साफ़……………….अगर किसी भय-या संकोच से टिप्पड़ी लिखने से तो अच्छा है—-कि टिप्पड़ी ही न लिखी जाए. तीसरी बात ये-कि आपने कुछ वयोवृद्ध नेताओं,राष्ट्राध्यक्षों का संज्ञान देते हुए,उनके वयानों को प्रस्तुत किया है———–जहां उन लोगों ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहा है—- मै मानता हूँ—–अक्सर ऐसा कहा जाता है————-बड़े-बड़े बुद्धिजीवी कहते सुने गए हैं———-पर उनके ये बयान मात्र एक विचार जैसे हैं,न कि संसदीय शाव्दाबली ………………………हमारे देश के महान नेताओं के अनोखे भाषण और विचार जब-तब चर्चित भी रहे हैं————-एक दशक पूर्व हमारे राष्ट्राध्यक्ष महोदय ने लाल किले कि प्राचीर से देश को संवोधित करते हुए कहाँ था——————-कि \"हमारे देश के किसान ज्यादा से ज्यादा चीनी कि फसल उगायें\"…………………….एक बार उनके द्वारा उसी लाल किले कि प्राचीर से संवोधन में \" स्वतंत्रता दिवस\" को गड्तंत्र दिवस\" और फिर ठीक उसी तरह———–\" गणतंत्र दिवस को उन्होंने स्वतंत्रता दिवस\" बताया था…………………………..इसी प्रकार एक जनसभा रैली में उनके द्वारा \"धान को चावल का पेड़\" कहकर संवोधित किया था. हम बचपन से देखते और सुनते आ रहे थे,आप के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा——————दशकों तक पुरे देश के डाक्टर अपने प्रतीक के रूप में \" लाल रंग का प्लस\" चिन्ह/निशान प्रयोग करते रहे—–कुछ तो आज भी करते हैं————बाद में पटा चला कि ये चिन्ह तो \"रेडक्रास संस्था\" का है,और डाक्टरों का चिन्ह एक \"क्रास जैसे प्रतीक पर सर्प लिपटे हुए\" बताया गया———–पूरा देश क्या….लगभग संसार कि आधी जनसँख्या इस लाल प्लस को ही डाक्टरों का प्रतीक मानती रही……….किसी को कोई आपत्ति नहीं………….पर अब पटा चला कि सभी डाक्टर अपने प्रतीक के स्थान पर रेडक्रास के प्रतीक चिन्ह का प्रयोग कर रहे हैं——————दशकों से प्रयोग कर रहे हैं————-कुछ ने बाद में सुधार कर लिया———कुछ आज भी रेड पलुस का प्रयोग कर रहे हैं…………कौन रोक सकता है उन्हें………….नेता बोल रहे हैं कौन रोकेगा उन्हें——किसकी शामत आई है————-किसकी बुद्धि भ्रष्ट हुई————जो जानबूझकर जाए,बनैले सांड के आगे. एक नविन अध्ययन से पटा चला है कि———–देश के आधे से अधिक नेताओं को \"भारत के संविधान\" और \"भारतीय दंड संहिता\" में अंतर नहीं पता,आपने सुना होगा,हमने भी सुना है—-जब-तब कई नेताओं के भाषण में ———–\"भारत के संविधान में ये कानून ………….\" \"भारत के संविधान कि धारा…………..\" कश्मीर के सन्दर्भ में धारा-३७०…….\" तो किया ये माना जाए,कि नेता सब-कुछ सही बोलते हैं——–वो समाज ही समय कि कसौटी पर खरा उतरता है……….जो सत्य को स्वीकारता है………..कुछ लचीला पण अपनाता है……….अपनी आलोचनाओं पर भी सद्भावना पूर्वक विचार करता है…………अपने में सुधार कि गुंजाइश रखता है…………… दूसरी बात मेरे भाषा भाव का आप अनर्गल और पुर्भावास पूर्ण आशय लगा रहे हैं,मेरा तात्पर्य है,जब हम बताते हैं,किसी को अपने शरीर के विषय में- कि हाथ,पाँव,सर,छाती,पेट आदि सव शरीर के अंग हैं,इन्ही अंगों से मिलकर शरीर बनता है—————–आपने कभी ये नहीं सुना होगा————ये हाथ,पाँव,पेट आदि शरीर के अभिन्न अंग हैं,—————- अर्थात जब शरीर के अंग हैं ही,……………..तो अभिन्न जोड़ने का आशय क्या है…………….कहीं-न कहीं तब हमारी भाषा संशय पैदा करती है………………..जब हम अभिन्न शव्द का प्रयोग करते हैं,तो सुनने वाले को ऐसा लगता है कि…………… यहाँ कुछ छुपाने……..दवाने का प्रय्यास हो रहा है…………अर्थात ये अंग तो है…….जो भिन्न भी हो सकता है,………हम एक दरार पैदा कर देते हैं———-अभिन्न अंग कहकर———–इससे हम स्वीकार करते हैं कि———-अंग शरीर से भिन्न भी हो सकता है————उसका अस्तित्व शरीर से अलग भी हो सकता है———-पर अभी हमने ऐसा जोड़ रखा है—————–कि अलग भी किया जा सकता है कभी —————-जबकि हम ये कहें कि शरीर का अमुक अंग है—–तव बात ज्यादा सार्थक होजायेगी———-संशय ख़त्म हो जायेगा——–स्पष्ट हो जाएगा——-कि अमुक अंग तो है,लेकिन शरीर के अस्तित्व के साथ-साथ,—–अलग करने कि चेष्टा करोगे————तो ये अंग नहीं रहेगा———इसमें प्राण नहीं बचेंगे————ये मृत हो जायेगा——–साद जाएगा शरीर से अलग होते ही——-अंग तब तक है जब तक शरीर से जुदा है———-अलग होते ही मॉस का एक लोथड़ा बन जायेगा—अंग नहीं रहेगा. सबसे पहली बात तो ये है,कि श्री मिश्रा जी आपके कमेंट्स को अद्ययतन एवं सूक्षम विश्लेषण उपरान्त प्रथम द्रष्टय: प्रतीत होता कि,श्री मिश्रा जी के व्यक्तित्व में कहीं-न-कहीं प्रत्येक के प्रति संशय और संदेह का भाव है,दूसरी बात श्री मिश्रा जी,आप स्वम के व्यक्तित्व और ज्ञान को ही पूर्ण और प्रमाणिक मान रहे है. श्री मिश्रा जी,ऐसा प्रतीत होता है,कि आपके व्यक्तित्व में \"तानाशाही\" या यूँ कहें \"डिक्टेटरशिप\" कि भावना है,और आप अपनी आलोचना पसंद नहीं कर पा रहे हैं,एक छटपटाहट ,एक भ्रम जैसी स्थिति है आपके मस्तिष्क में,आपका व्यक्तित्व कहीं-न-कहीं \"मै\" कि भावना से ओतप्रोत है,अहंकार सा भरा है,आपके विचारों में…………कुछ इसमें शीतलता-कोमलता-स्थिरता-एक साम्य-संतुलन कि संभावना पैदा करें ,अपने अन्दर.

abodhbaalak के द्वारा
October 28, 2010

मालिक जी, बहुत ही शानदार लेख, आपने इस लेख में व्यंग, हास, इतिहास आदि सरे रसों का मिश्रण किया है, और क्या खूब किया है. मै आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ की कश्मीर भारत का अंग है जैसे की अन्य राज्य है, और ये सदा ही हमारा रहेगा http://abodhbaalak.jagranjunction.com

kmmishra के द्वारा
October 28, 2010

कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है यह बात तो भारत का संविधान भी कहता है । क्या आप उसको भी गिलानी और अरूंधतीराय की श्रेणी मे रख देंगे ।

kmmishra के द्वारा
October 28, 2010

वंदेमातरम सरजी । आपका लेख पढ़ कर बहुत ही खुशी हुयी। लेकिन आपने \"कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग\" कहने वालों को भी गिलानी और अरूंधती राय की श्रेणी में खड़ा कर दिया । मेरे लेख ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ पर कूलबेबी ने आपत्तिजनक टिप्पणी की । उसके बाद मैंने उस छद्म नामी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया । अब आपका यह लेख लगता है उसी मोर्चे का जवाब है । आपकी जानकारी के लिये भारत सरकार और दूसरी विपक्षी पार्टियो के हाल के बयान (जिसमें कम्युनिस्ट भी शामिल हैं) रख रहा हूं । क्या मैं यह समझूं कि कूलबेबी के नाम से आप ही आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रहे थे । ___________________________________________________________ 15 अगस्त 2010 इंडो एशियन न्यूज सर्विस नई दिल्ली। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 64 वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आज लगातार सातवीं बार लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रध्वज फहराया। इस अवसर पर उन्होंने नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताते हुए साफ किया, हिंसा का सहारा लेने वालों से कड़ाई से निपटा जाएगा। साथ ही उन्होंने कहा, कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। ________________________________________________________________________ भोपाल ! भारतीय जनता पार्टी .भाजपा. की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष और सांसद प्रभात झा ने कश्मीर मामले में अलगाववादियों के समर्थन में नक्सलियों द्वारा 30 सितम्बर को छह राज्यों में बंद के आह्वान पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अफसोस जताया और कहा कि देश में पहली बार हुआ है जब माओवादियों ने कश्मीर के अलगाववादी एवं भारत विरोधी ताकतों को समर्थन किया है ! श्री झा की ओर से आज यहां जारी एक विज्ञप्ति में गहरी चिंता जताते हुए कहा गया है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है ! 30 Aug 2010 07:57:00 PM IST _____________________________________________________________ केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री फारुक अब्दुल्ला ने सोमवार को कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा रहेगा। ____________________________________________________________ जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग भाजपा Posted On October – 27 – 2010 मंगलवार को गुडग़ांव में भाजपा नेता उपायुक्त कार्यालय के बाहर जम्मू-कश्मीर के भारत संघ में विलय दिवस के अवसर पर ज्ञापन देने जाते हुए। चित्र-हप्र गुडग़ांव, 26 अक्तूबर (हप्र)। जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और आज के दिन ही जम्मू कश्मीर ने भारत संघ में विलय किया था। यह याद दिलाने के लिए भाजपा ने आज राष्ट्रपति को एक ज्ञापन भेजा है। ___________________________________________________________ कश्मीर भारत का अभिन्न अंग : कालरा Thursday, 28 Oct 2010 8:15:13 hrs IST सलूम्बर। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इसके टुकडे नहीं होने देने के लिए जनता को जागृत होना पडेगा। यह विचार विद्याभारती राजस्थान क्षेत्र के अध्यक्ष डॉ. मनोहरलाल कालरा ने व्यक्त किए। ____________________________________________________________ कश्मीर भारत का अभिन्न अंग -कर्णसिंह श्रीनगर। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्बदुल्ला के बयान पर कश्मीर के अंतिम महाराजा हरिसिंह के पुत्र और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डा. कर्ण सिंह ने कहा है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। _____________________________________________________________ शनिवार, 04 सितम्बर 2010 17:01 कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। कृष्णा भारत के विदेशमंत्री ने यह बात दोहराई है कि जम्मू व कश्मीर, भारत का अभिन्न अंग है। एस.एम.कृष्णा ने कहा है कि हमें इस बात का विश्वास है कि चीन सरकार हमारी संवेदनशीलता का सम्मान करेगी। _____________________________________________________________ पाकिस्तान की हमेशा से कश्मीर पर लालची निगाहें रही हैं। जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ उस वक़्त भी पाकिस्तान कश्मीर को अपने में शामिल करना चाहता था। लेकिन जम्मू- कश्मीर के राजा हरि सिंह भारत या पाकिस्तान दोनों में से किसी देश में शामिल होना नहीं चाहते थे। लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। राजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और भारत ने अपना मानते हुए उनकी मदद की। बाद में समझौता हुआ कि जम्मू- कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा होगा। उसके बाद 5 दशकों से ज़्यादा का वक़्त गुज़र चुका है और एक बार फिर जम्मू- कश्मीर के सीएम ने अभिन्न अंग को लेकर कुछ सवाल उठाए हैं, लेकिन भारत के संविधान से लेकर भारत के बच्चा- बच्चा जानता है कि कश्मीर भारत का अभिन्न, अखंड और अविभाज्य हिस्सा है। _____________________________________________________________ उमर अब्दुल्ला का बयान अक्षम्य भारी भूल: आडवाणी नई दिल्ली, एजेंसी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जम्मू कश्मीर के विलय पर राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के विवादास्पद बयान की कड़ी आलोचना करते हुए रविवार को इसे एक अक्षम्य भारी भूल करार दिया। भाजपा नेता ने कहा कि वास्तविकता यह है कि हैदराबाद और जूनागढ़ समेत 500 से अधिक देशी रियासतें भारत के स्वतंत्रता के बाद उसके अभिन्न हिस्सा हो गये और उन्होंने जम्मू कश्मीर की तरह ही विलय पत्र पर हस्ताक्षर किया था। पूर्व भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि न केवल भाजपा ने बल्कि पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी से लेकर वर्तमान विदेश मंत्री एसएम कृष्णा समेत देश के प्रत्येक नेता ने जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना है। भारतीय संसद ने भी इसे देश का अभिन्न अंग करार दिया है। _____________________________________________________________ नई दिल्ली, (जर्नलिस्ट टुडे नेटवर्क)… विदेश मंत्री एस. एम. कृष्णा ने कहा है कि पाकिस्तान लोकतंत्र व मानवाधिकार का पाठ भारत को न पढ़ाये। विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को जम्मू- कश्मीर में राज्य प्रायोजित आतंकवाद बंद करने को भी कहा है।संयुक्त राष्ट्र की 65वीं महासभा में अपने संबोधन में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कृष्णा ने कहा कि जम्मू और कश्मीर, जो भारत का अभिन्न अंग है, पाकिस्तान प्रायोजित उग्रवाद और आतंकवाद के निशाने पर है। पाकिस्तान को अपना यह वचन निभाना चाहिए कि वह अपने नियंत्रण वाले भूभाग से भारत के खिलाफ निर्देशित आतंकवाद की इजाजत नहीं देगा। _____________________________________________________________ अरूणाचल भारत का अभिन्न अंग : करात (08:54:19 PM) 25, Oct, 2009, Sunday नई दिल्ली ! भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(सीपीआई-एम) के महासचिव प्रकाश करात ने रविवार को अरूणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग बताते हुए उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और चीन के प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ सीमा विवाद को सुलझा लेंगे।

October 27, 2010

अच्छे लेख और अच्छी लेखन शैली ……………. इस लेख के लिए हार्दिक बधाई………….

s.p.singh के द्वारा
October 27, 2010

बहुत बढ़िया गागर में सागर —-


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