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रियेलिटी या लुटी-पिटी शो:झूठ का सच

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मीडिया ही नहीं,दर्शक भी दोषी:रियेलिटी के नाम पर घासले

जिस प्रकार “विश्व कप क्रिकेट में फिक्सिंग” उजागर होने पर,क्रिकेट का जूनून ही लोगों में ख़त्म हो गया,ठीक उसी प्रकार रियेलिटी के नाम से “इलेक्ट्रानिक मीडिया और मनोरंजक कार्यक्रम ” भी रोमांच खो चुके हैं . मीडिया हांलाकि देश की जनता के लिए बहुत कुछ कारगर और प्रासंगिक है,और मीडिया द्वारा कभी-कभी तो युगांतकारी भूमिका भी निभाता है……पर मौजूदा परिद्रश्य और परिपेक्ष में मीडिया की ये सकारात्मक छवि “टी.आर.पी.” के चक्कर में अपने लक्ष से भटकती दिखाई देती है……विशेष रूप से इलेक्ट्रानिक मीडिया उस दिशा में नहीं जा रहा,जहां उसे जाना चाहिए.

आजकल भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया/डिश चैनल्स पर “रियेलिटी शोज़” की मारंमार है,रियेलिटी के नाम पर “साग-भाजी” या “घासलेट” परोसा जा रहा है…………………

मीडिया के इस गिरते स्तर के लिए आखिर ज़िम्मेदार कौन है ?

रियेलिटी शो के नाम पर “वेवजह के विवाद” और “आधारहीन तथ्य” प्रस्तुत कर मीडिया “वेशर्मी की हदों को तोड़ता” जा रहा है…….बिग बॉस में “शादी-शुदा जोड़े की कूट रचित प्रपंचपूर्ण दुवारा शादी की घोषणा” और विवाह संस्कार/निकाह की रस्में अदा कर दर्शकों के साथ धोखा करने में भी मीडिया को “लाज नहीं आई”……………..”राखी का इन्साफ” का तो नाम ही “राखी के विवाद” होना चाहिए था,तब ये कार्यक्रम वास्तविक “रियेलिटी शो” होता…….अब तो सब कुछ कृत्रिम और वनाबती है…….चाहें कार्यक्रम में जूतियाँ-चप्पलें चलें……..या गालियाँ दी जाए…..मारपीट और धमकी दी जाती हों…….या फिर राखी की “असभ्य भाषा और विंदास अदाएं” हों,या ६०% से अधिक राखी सावंत नंगी दिखें……सब बनावटी और इस बनावटी ने तो एक बेचारे की “जान” ही लेली.


खेल टी.आर.पी. का

चूँकि सभी इलेक्ट्रानिक चैनल्स अपने प्रोग्राम का स्तर ,उस कार्यक्रम को पसंद करने/देखने वाले दर्शकों की संख्या (अर्थात टी.आर.पी.) पर निर्भर हैं………….कार्यक्रम की टी.आर.पी. जितनी ज्यादा होगी……..उसको मिलने वाले विज्ञापनों/प्रचार कांट्रेक्ट उतने ही ज्यादा होंगे…….अर्थात उस चैनल के कार्यक्रम की उतनी ही ज्यादा कमाई…….सीधा सा अर्थशास्त्र………सीधा सा गणित.

भूतों का साया “सभी चैनलों प

टी.आर.पी. का वढना-घटना प्रत्यक्ष रूप से कार्यक्रम देखनें वाले दर्शकों की संख्या पर निर्भर है…….जिस प्रकार के कार्यक्रमों की टी.आर.पी. ज्यादा होती है…………..अन्य चैनल्स भी उसी प्रकार के कार्यक्रम परोसने लगते हैं…………………और एक अंधी घुड़दौड़/भेद चाल शुरू…………..हर तरफ कभी भूत-प्रेत और रहस्यमयी शक्तियों पर हर चैनल शुरू……………………कभी सैक्स-रैकेट,सैक्स-संबंधों,और घरेलु हिंसा पर………………..जब तहेल्का डाट काम रहस्योद्घाटन….बेस्ट-एंड प्रकरण….उजागर हुए,तो स्टिंग-आपरेशन की हर चैनल पर बाड़ सी आ गयी……..कभी सब फुल्ली धार्मिक हो जाते हैं…………..


“रियेलिटी शोज़” सस्ता और आसान फिल्मांकन:बढिया कमाई

इसी क्रम में आजकल “रियेलिटी शोज़” हर चैनल का उद्धारकर्ता बन गया है…..ये वो कार्यक्रम होते हैं,जिसमें निर्माताओं/मीडिया कर्मियों/प्रोजेक्ट टीम को सबसे कम मेहनत में ज्यादा से ज्यादा टी.आर.पी. लाभ मिल रहा है…….बस किसी प्रसिद्द सज्जन के घर पर चार-छाई विवादित हस्तियाँ इकठ्ठा कर दिन…….और हिडन कैमराज़ से उनकी हरकतों को प्रोग्राम के नाम पर दर्शकों को परोस दिया………….. सब चैनल आजकल रियेलितिमय की धुन में दौड़ रहे हैं…..तो इसके लिए हम ही (यानी दर्शक) ज्यादा ज़िम्मेदार है…………..अर्थात जब कोई कार्यक्रम ज्यादा पसंद किया जा रहा है,तभी तो उसकी टी.आर.पी. हाई है…..और सब वोही दिखाना चाह रहे हैं.

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ अपनी ज़िम्मेदारी समझे

दर्शक-गण ज्यादा दोषी हैं,इलेक्ट्रानिक मीडिया के गिरते स्तर के लिए,पर इलेक्ट्रानिक मीडिया भी कम दोषी नहीं है….इस गिरावट के खेल में………कारण मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाता है,अर्थात प्रजातंत्र का संरंक्षक और वो इस मामले में लगभग भारतीय संसद और न्यायपालिका के समकक्ष न सही,कम-से-कम स्तरीय भूमिका का निर्वाह करना चाहिए.

बात “पीपली लाइव” त

पिछले दिनों रिलीज़ आमिर खान की ग्रामीण पृष्ठभूमि और “क़र्ज़ के कारण किसान आत्महत्या” मुद्दे के साथ-साथ इलेक्ट्रानिक मीडिया की ” कार्यशैली और सोच” का वास्तविक चित्रण तो प्रस्तुत करती ही है,साथ ही मीडिया की प्रासंगिकता पर कटाक्ष करती है………………फिल्म में वोही वास्तविक तथ्य दिखाने का प्रयास किया गया है,……….हांलाकि कहीं-कहीं “डायरेक्टर अतिवादिता से प्रेरित” प्रतीत होता है,पर विषय दमदार प्रस्तुति है.

पीपली माता का प्रपंच :ये है रियेलिटी

पीपली लाइव फिल्म , इलेक्ट्रानिक मीडिया की कार्यशैली का समीक्षात्मक दर्पण प्रितिविम्ब है,………कैसे एक गरीव किसान को न चाहते हुए भी “आत्म हत्या का पात्र” बनाया जाता है,……किस प्रकार मीडिया एक आम आदमी के जीवन में,उसके घर और परिवार में विन बुलाये घुसपैट कर,उसकी आम ज़िन्दगी में दखलंदाजी करती है,…..किस प्रकार उसकी निजता को भंग कर ,उसे सार्वजनिक नंगा कर देती है………………. साथ ही रहस्य और रोमांच और एक्सक्लूसिव बनाने के लिए,खुद मीडिया” पीपली माता” का प्रपंच खड़ा कर अपना उल्लू सीधा करती है……….ठीक-ठीक वास्तविकता को दर्शाया गया है.

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

David के द्वारा
February 3, 2014

At last! Something clear I can undrestand. Thanks!

div81 के द्वारा
November 17, 2010

मिडिया के पास काम बचा नहीं है नहीं तो ये देश के जवलंत मुद्दे उठाते न की रियल्टी शो की बकवास और उल्झुलुल से बाबाओं की बचकानी बातों को नहीं दिखता अच्छा लेख

div81 के द्वारा
November 17, 2010

मिडिया के पास काम बचा नहीं है नहीं तो ये देश के जवलंत मुद्दे उठाते न की रियल्टी शो की बकवास और उल्झुलुल से बाबाओं की बचकानी बातों को नहीं दिखता अच्छा लेख |

div81 के द्वारा
November 17, 2010

मिडिया के पास काम नहीं है नहीं तो वो देश के जवलंत मुद्दे उठता न की रियल्टी शो की बकवास और उल्झुलुल के बाबा को नहीं दिखता | अच्छी पोस्ट

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 17, 2010

नमस्कार मालिक जी,अभी देखने की जरुरत है की आगे क्या क्या होता है,धन्यवाद!

jalal के द्वारा
November 17, 2010

आजकल तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया बस अपनी टीआरपी को लेकर पड़ी हुई है. चाहे कुछ भी दिखाना पड़े. अब तो मनोरंजन को अश्लीलता में तब्दील कर दिया गया है. मतलब उन पहलुओं को छुआ जा रहा है जिसे कभी सोच कर भी शर्म आती थी. और बोलना तो सीधे सीधे गलती में गिना जाता था. अब तो समाचार वाले भी ठीक से समाचार नहीं दिखाते. बीच बीच में साँय साँय की आवाजें और एक ही बात बार बार दुहराते रहते हैं. और तो और अब न्यूज़ में धारावाहिक भी दिखाना शुरू कर दिया गया है. समाचार देखने के लिए बैठे तो मालूम चलता है जैसे गलती कर ली हमने. खैर इन को झाडती हुई अच्छी पोस्ट लिखी आपने. शुक्रिया.

ashvinikumar के द्वारा
November 16, 2010

भाई मलिक जी अपने ठीक ही कहा है ………………जय भारत


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