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जहां, बस तेरी याद और तन्हाइयां बचें:और तेरा तसव्वुर

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आज तुमनें ये कैसा बचकाना सा सबाल किया—- कि कहाँ तुम चले गए ?…………………. मेरे कातिल ने क़त्ल करके हाथ बहुत मले होंगे, जब उसने मेरे तड़पने का सलीक़ा जो देखा होगा. अरे तुम छोड़ा ही कहाँ इस काबिल कि कहीं चले जाए,हमने तो इस ज़िन्दगी का लम्हा-लम्हा,पल-पल और हर पल तुझ पर बक्फ़ कर दिया………तू चाहे तो फ़लक का तारा बना ले,तू चाहे तो क़दमों से कुचलदे…….. एक आह भी निकलेगी,चान्हें जो ज़ुल्म-ओ-सितम बरपा हो जाएँ………… तू इतना तो यकीं और हौंसला रखना कि मै लौट के तो आऊंगा, तेरा वादा तो नहीं हूँ,जो बदल जाऊँगा………न मै वो मोम हूँ जो पिघल जाऊँगा………….रात भर दीद आये………नाम नाक पर लहराते रहे……….सुबहा कि तरह लोग आते रहे,जाते रहे………खुश थे हम कि अपनी तमन्नाओं का खुआब आएगा,……….कान्कुले चेहरे पे ढलकाए हुए आएगा……….पट्टियां खडकी तो हम समझे कि आप ही गए……….पर तुमको न आना था,ना आप आये…….इस तरह ख्याल आते रहे,जाते रहे. हाँ,हम चले जा रहे हैं,एक नामालूम मंजिल की तरफ,………..एक नामारुफ़ जहान की तलाश में…………….एक नामाकुल मौका और वक्त की बंदिशों से परे………….तुम ही तो कहती थीं,कि जब-जब मेरी याद आये…….अपने दिल कि धडकनों में खोजना………..अपनी साँसों कि खुशबु में खोजना………….सो,येही एक तदवीर मालूम पड़ती है………..अपनी तक़दीर की मजबूत इमारत की तामीर और संग-ऐ-वुनियाद तलाशने. ज़िन्दगी तुने मुझे क़ब्र से कम दी है जगह, पाँव फैलाऊं तो सर दीवार से लगता है. कभी-कभी लगता है,कि तुम्हारा वजूद उस खुशबु कि मानिंद था,जो हवा के झोंकों के साथ,हवा में काफूर हो गया…….. पर मेरा दिल……….मेरा ज़मीर…… मेरे ख्यालात……….मेरी सोच……….. और तुझमें बे-इन्तेहा मुहब्बत,तेरी कशिश,तेरा तनाज़ुन,मेरे प्यार की इन्तहा,और इव्तदा मेरे प्यार की…..पुरजोर कशिश………… मेरे बजूद को तेरे तसब्बर के कफस में क़ैद कर,सलीव पर लटकाए हुए,धीरे-धीरे मेरे जिस्म का ज़र्रा-ज़र्रा … बूंद-बूंद खून निचोड़ रहा है,और मेरी रूह को एक बेहद जालिमाना तरीके से कब्ज़ करने में मुब्तिला है…………बस मेरी हालत तो कुछ यूँ है,कि अपने हालात को लफ़्ज़ों में अंदाज़े बयान करना,मेरे बूते में नहीं है,अपने अहसास इस शेर के ज़रिये ज़ाहिर करने की कोशिश है- ज़िन्दगी आ तुझे कातिल के हबाले कर दूँ, मुझसे अब ये कहने तमन्ना देखि नहीं जाती. पर न तो हम इतने खुश-नसीब हैं,न हमारे हालात इतने खुश्गबार…………. ज़िन्दगी अब हमें घुट-घुट कर जीना गबारा नहीं………. पर तुझे पाना,तेरा दीदार अब शायद मेरे नसीब से ज्यादा कीमत की चीज़ है………और मेरी मौत भी इतनी बेदार नहीं……..तड़पता हूँ,कि तड़प-तड़प कर जान देदूं- कैदे-ग़म भी दिल्लगी है,ज़माने के लिए अन्दलीव आकर कफ़स में तमाशा बन गयी. सय्याद कफ़स लेकर उड़ ना जाऊं मैं कहीं, ज़ालिम न ले इम्तेहान मेरा,पर कतरने के बाद * लफ्ज़-ऐ-तर्जुमा: (अन्दलीव=बुलबुल जैसा खुबसूरत परिंदा , कफ़स=पिंजरा, सय्यद=चिड़ीमार )

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

saima malik के द्वारा
December 6, 2010

बात कुछ पुराने वक्त की सी है,पर है मजेदार और दिलचस्प…….शायद सच भी हो……….हुआ कुछ यूँ था…………….एक शख्श मुशायरा सुनने अपनी बस्ती से दूर शहर जा रहा था,कि रास्ता में एक जगह “बेरी के पेड़” के नीचे बैठकर पेशाब करने लगा,देखता क्या है,अचानक एक ताज़ा पका सुर्ख बेर पेड़ सामने पड़े गोबर में आकर गिरा………..कहने लगे,सद-अफ़सोस ऐसा तरोताज़ा,चमकदार,और शायद लज़ीज़ बेर कमबख्त किस्मत में न था….कमबख्त को गिरना ही था,कुछ हटके ही गिर जाता……..क्या चला जाता…….अब क्या मिल गया,पड़ा है गंदे गोबर में ………सड़ेगा…..कीड़े पड़ेंगे,तब पता चलेगा. पर बेर के सुर्ख चमकीले रंग कि कशिश,भीनी खुसबू,तरोताजगी उनके दिल को बार-बार माज़ूर करती,कि उठा कर खाले………..पर दुवारा ज़मीर ललकारता…..क्या गंदा बेर खाना,शर्म आणि चाहिए. ज़मीर और जुबान में से आखिर जीत जुबान कि हुई,इंसानी फितरत हाबी हो गयी…..इधर-उधर साबधानी से देखा ,कि कोई देख तो नहीं रहा है,तन्हाई का इत्मीनान करके,बेर गोबर से निकाला,पास के तालाब में धोया………..और खाया,बास्तव में लज़ीज़ और जायकेदार था,बेकार ही महरूम रह जाते……….इस लज़ीज़ फल से………..और पहुँच गए कब्बाली प्रोग्राम में. कब्बाल ने अपना सुर-ताल लय-और-साज़ संभाल कर कब्बाली शुरू कि- या खुदा तेरा जलबा,नूर जो टपका ज़मी पर तेरा किसको कहाँ ,कैसे, कितना महस्सर महस्तर वो मै जानता हूँ,या ये ……. कहो तो कह दूँ?…. आ..आ..आ…उन कहो तो कह दूँ? तक….तक….तक धिन…..तक……आ ….या खुदा कहो तो कह दूँ?……….. बस उन साहेबान को तो पसीना आ गया,कि आज तो भरी महफ़िल में फजीहत हो जायेगी……..शायद इस शायर ने मुझे बेर उठाकर खाते हुए देख लिया है……….कमबख्त कहाँ छुपा था,जो देख लिया…….पर मुझे दिखाई नहीं दिया……..अब राज़ खोलने कि धमकी दे रहा है. तरकीब सोचने लगे,क्या करू,उठकर भाग जाऊं,या छिप जाऊं कहीं पीछे……….पर फिर सोचा,कि तब ते मेरे पीछे ये राज़ पूरी महफ़िल को बता ही देगा….आज इज्ज़त सरे-बाज़ार नीलम होने से कोई माई का बाप नहीं रोक सकेगा…कमबख्त बड़ा हरामी कब्बल है. अचानक उठे,दस का नोट कब्बल को पेश कर दिया…..आकर अपनी सीट पर बैठे ही थे,कि कब्बाल ने फिर बोही मिसरा…………कहो तो कह दूँ? फिर बापस तेज़ी से भागे,दस का नोट फिर कब्बाल को … मुह फेरा ही था लौटने को………………….कि कब्बाल ने फिर….कहो तो कह दूँ ? भागे दस का नोट कब्बाल को कब्बाल और जोश में………..कहो तो कह दूँ ? भागे पचास का नोट कब्बाल को थमाया लौटे कि कब्बल ….तक…तक….धिन…धिन… कहो तो कह दूँ ? फिर पचास का कहो तो कह दूँ ? फिर सौ का नोट ……………पर हालात फिर जस-के-तस …कहो तो कह दूँ ? कब्बाल बार-बार वोही लाइन दोहराए जा रहा है,कि शायद ज्यादा ही अच्छा मिसरा है,जो इतनी दाद,और नोटों कि बारिश हो रही है……जितना वो नोट देता…कब्बाल उतने ही जोश से…कहो तो कह दूँ ? जब थक गए,जेब भी लगभग ख़त्म होने को थी……..तमतमा गए…भिन्न गए……अजीब अहमक और ज़लील कब्बाल है,इतना रुपया दे चूका,फिर भी चुप नहीं रही….न मौजु बदल रहा. भड़कते हुए खड़े हो गए………….वोले कहना है तो कह दे….क्या कहेगा….मैंने भी धोकर तो खाया था बेर,कोई गोबर से निकाल ऐसे ही थोड़े चबा गया….कह दे अब तू . ….जो भी होगा देखा जाएगा…..पर एक बात है,आज तू निकल इस महफ़िल से बाहर,तब बताऊंगा

saima malik के द्वारा
December 6, 2010

                        शाही जी,नमस्कार………..बहुत दिनों के,हम बे-बतनों को याद बतन की मिटटी आई है,………..सो अब आपकी चिट्ठी आई है………………जिसके लिए तमाम अम्बार शुक्रिया. उर्दू के तलफ्फुज,अंदाज़े बयान,तसरिः(प्रोनाउनसियेशन,प्रजेंटेशन,एंड एक्सप्लेनेशन ऑफ़ उर्दू) के बेदर्द इस्तेमाल का अनूठा प्रयोग- नीम-हकीम खतरा-ऐ-जान और नीम मुल्ला खतरा-ऐ-ईमान उर्दू अदव और तहजीब की महफ़िलों में जोक-ओ-शौक से शायर को बार-बार दाद देने के जुमले उछालते एक साहेबान के पड़ोस में बैठे (उर्दू अलफ़ाज़ की कम जानकारी बाले शख्स) ने उन्हें उर्दू का माहिर और जानकार समझते हुए पूछा……….जनाब इस शेर का खुलासा-ऐ-मतलव बयान कर दीजिये. तो उस माहिर इल्मी-शक्सियत ने कुछ यूँ खुलासा बयान किया- शायर के कहने का अंदाज़ ये है,कि हकीम तू नीम के पेड़ के नीचे मत बैठ……वर्ना वहां तेरी जान भी खतरे में है और ईमान भी……………..बाह कमाल कर दिया.

आर.एन. शाही के द्वारा
December 6, 2010

सय्याद ने क़फ़स से उस जहां की अंदलीव को इस जहां की अंदलीव के लिये आज़ाद कर दिया । क्या ये कोई फ़ातेहा है सायमा जी?


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