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भारत में रहे थे “ईसा”:किशोरावस्था के १८ वर्ष,और क्रुसिफिकेशन के बाद

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क्या वायविल और कुरआन में वर्णित “व्लेस लैंड” या “महफूज़ जगह” भारत में है?

क्या जीसस ने अपने जीवन के १८ वर्ष से अधिक भारत में व्ययतीत किये थे ?

क्या जीसस हेमिस मोनास्ट्री लद्दाख और कश्मीर में रहे थे?

क्या जीसस जीवन के अंतिम दिनों में पुन बापस भारत आये थे?

क्या पैगम्बर मूसा,ईसा,आदम,नुह,और सीश भारत में दफन है?

क्या पैगम्बर आदम स्वर्ग से धरती पर भारत में उतारे गए,और जीवन के अधिकाँश समय भारत में रहे,यहीं उनकी मृत्यु और अंतिम संस्कार हुआ,और उनकी कब्र भी भारत में है?

जीसस की १२ से ३० वर्ष की आयु अर्थात किशोरावस्था के १८ वर्षों का विवरण बायविल सहित किसी ईसाई धर्म ग्रन्थ में नहीं है.जीसस के भारत में रहने के विषय में सर्वप्रथम १८९४ ई. में एक रुसी युद्ध संवाददाता निकोलस नातोविच “लद्दाख में हेमिस मोनास्ट्री ” के साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए दावा किया था.मोनास्ट्री के अभिलेखों में “ईसा (जीसस का अरेबिक रूपांतरण ईसा )का जीवन,सर्वोत्तम पुत्र ” के रूप में दर्ज है और स्वामी अभेदानंद ने १९२२ में इस स्थान का भ्रमण करते हुए साक्ष्यों का अवलोकन किया,और जीसस के भारत सम्बन्धी पूर्व दावों की पुष्टि की. १८६९ ई. में लुईस जेकोलियत ने श्री कृष्ण को जीसस क्रिस्ट बताते हुए,इस सम्बन्ध में साक्ष्य सहित “भारत में वायविल,या जीसस कृष्ण का जीवन” पुस्तक लिखी १९०८ ई. में “आकाशिक रिकार्ड” लेवी एच. दाव्लिंग ने “जीसस के वायविल विवरण से गुम “खोये १८ वर्षों के जीवन” पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए दावा किया,कि जीसस इन वर्षों में भारत में रहते हुए ,भारत के अतिरिक्त तिब्बत,परसिया,असीरिया,ग्रीस और मिस्र भ्रमण को भी गए.

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jesus indiajesus news

जीसस के भारत सन्दर्भ में समाचारपत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट्स

rosebel shrinejesus real grave kashmir

कश्मीर में सूफी युसफ अल दरगाह,जिसे ईसा की कव्र बताया जाता है.

jesus route to india and chinajesus and moses india

जीसस के भारत आने और अन्य जगहों को जाने सम्बन्धी मार्ग नक्शा

jesus kashmirroza bal grave

दरगाह रोज़ा बल कश्मीर,जिसे जीसस से जोड़कर देखा जाता है.

map to gravenotovitch

दरगाह की स्थिति दर्शाते भौगोलिक मानचित्र

jesus kashmirhemis monastry laddaakh

हेमिस मोनास्ट्री लद्दाख,माना जाता है,जीसस ने १८ वर्ष यहाँ व्ययतीत किये.

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
June 11, 2012

आदरणीय  मलिक  साहब, सादर नमस्कार। ईसु इंडिया में आये, बाइविल  में तो नहीं है, है कहाँ पर  मित्रवर आधार तो बतलाइये। पीने की तो बात दूर छुउँगा भी नहीं इसे, धरम  की मदिरा न  मुझको पिलाइये। युगों बाद छूटे हैं विदेशियों के चंगुल  से, धरम  से फिर न गुलाम  ये बनाइये। मानवता धर्म  एक  आओ   अपनाय  हम, धरम  की बातों से न हमें उकसाइये। मंदिर और मस्जिद तोड़के क्या मिला तुम्हें, बातें वही करके न  हिंसा करवाइये। छोटि छोटि जाति उपजातियों में बाँटकर, दूजा पाकिस्तान  फिर से नहीं बनाइये। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ग्रंथ  ये  जितने बने हैं पुस्तकें कानून  की थी, हमने ईश्वर को जनम दे, आदमी में डर भरा है। मृत्यु असफलता की आशंका हुई जब बुद्धि को, तब ही तो इस  धर्म  का निर्माण  ये हमने किया है। स्वार्थ  बुद्धि आनियंत्रित  आदमी की हो रही थी, आदमी हो न  अनैतिक, धर्म  से इतना डरा है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ अद्वतीय, स्वयंभू, असीमित, आत्मनियत विश्व या द्रव्य को स्पिनोजा प्रकृति या ईश्वर कहते हैं। ये विश्व को ईश्वर नाम देकर, ईश्वर शब्द के प्रचिलित अर्थ को त्यागते हैं। ईश्वर का अर्थ वह सत्ता है जो समस्त विश्व से प्रथक है और इसका सृष्टा और रक्षक है। यदि ईश्वर का अस्तित्व समस्त विश्व से प्रथक है तो ईश्वर न तो गुणों में और न शक्ति में असीमित रहेगा, इसलिये ईश्वर नहीं रहेगा। यदि ईश्वर समस्त विश्व से भिन्न है तो भिन्नता तभी संभव है जब समस्त विश्व में ऐसे गुण संभव हों जो ईश्वर के गुणों से भिन्न हों। इसका अर्थ यह हुआ कि ईश्वर में कुछ गुणों का अभाव होगा। इसी प्रकार यदि समस्त विश्व का ईश्वर से प्रथक अस्तित्व है तो ईश्वर की शक्ति सीमित है। कोई भी दो द्रव्य एक दूसरे की शक्ति को सीमित करते हैं। इसलिये ईश्वर का कोई प्रथक अस्तित्व नहीं। प्रकृति और ईश्वर एक अद्वितीय, असीमित और स्वयंभू द्रव्य के दो नाम है, जैसे किसी व्यक्ति के दो नाम होते हैं। स्पिनोजा ने समस्त विश्व को ईश्वर इसलिये कहा है कि वे समस्त विश्व के आध्यात्मिक पक्ष की सत्यता पर जोर देना चाहते थे। स्पिनोजा के अनुसार प्रकृति या ईश्वर ही स्वतंत्र है। स्वतंत्र साधारणतया अपनी मनमानी इच्छा से काम करने वाले को कहा जाता है। किन्तु असीमित प्रकृति या ईश्वर की कोई इच्छा नहीं हो सकती। इच्छा तो सीमित व्यक्तियों का लक्षण है। जब स्पिनोजा प्रकृति या ईश्वर को स्वतंत्र कहते हैं, तब उनका अभिप्राय यह है कि प्रकृति या ईश्वर का कार्य किसी बाहरी शक्ति के द्वारा निर्धारित नहीं होता, बल्कि उसके अपने स्वभाव का अनिवार्य परिणाम है। विश्व पूर्ण है। इसमें न कुछ बढ़ाया जा सकता और न कुछ घटाया जा सकता, जैसे 2+2=4 के अतिरिक्त अन्य संख्या नहीं हो सकती। मनुष्य की उच्चतम अवस्था वह है जो ईश्वर को बौद्धिक रूप से प्यार करे। ईश्वर केवल समस्त विश्व का नाम है। जिसका ताना-बाना तार्किक है। समस्त विश्व के लिये प्यार का आधार आवेग नहीं, बल्कि बुद्धि है। जिस चीज को हम प्यार करते हैं, उसके साथ एक हो जाते हैं। जब स्वतंत्र मनुष्य एक अद्वितीय, स्वयंभू, असीमित और नित्य विश्व का द्रव्य के साथ एक हो जाता है, तब वह मानसिक रूप से नित्यता का अनुभव करता हैं। जो अवर्णीय है। बुद्धि से स्वार्थ भावना के साथ साथ मृत्यु और असफलता की आशंका भी जन्म लेती है। अपने अहम् भाव के सृजित होने के कारण, विनाश के संभावना की चिंता तथा कर्मों की असफलता की संभावना से उदिग्न होने के कारण बुद्धि प्रतिकार करके, नैतिकता की संभावना बनाती है। उसके उपाय स्वरूप कपोल कल्पनाओं द्वारा धर्म का उदय होता है। पहली कपोल कल्पना से अलौकिक तथा देवीय अस्तित्व कायम कर, उसकी स्वार्थ परता पर दण्ड की संभावना से नियंत्रित करता है। समाज विरोधी कर्मों पर अंकुश लगाने से समाज व्यवस्थित होता है। दुसरी कपोल कल्पना से आत्मा की अमरता के कारण, मृत्यु की आशंका से मुक्त होता है। तीसरी कपोल कल्पना से, सर्वशक्तिमान दयालु ईश्वर एवं उसकी आराधना के विधान से कठिनाई के समय सहायता द्वारा असफलता की आशंका से मुक्ति होती है। मानवीय ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टकोण की तीन अवस्थायें हैं-१.ईश्वर परक- यह प्रथम तथा निम्न अवस्था है। जिसे मानव का शैशवकाल कह सकते हैं। इस अवस्था में मनुष्य इन्द्रियातीत सत्ताओं तथा शक्तियों में पूर्णतः विश्वास करता है। बालक की तरह प्रत्येक प्राकृतिक घटना का अनुभवातीत देवीय पुरुष में ही ढ़ूढ़ता है। अनुभवातीत देवीय शक्तियों एवं उनमे विश्वास करने वाले गुरुओं का अधिक महत्व होता है। व्यक्ति और समाज दोनों को इस अवस्था से गुजरना पड़ता है। २.तात्विक- देवीय शक्तियों का महत्तव समाप्त कर उनके स्थान पर मनुष्य नैर्वेयक्तिक अमूर्त शक्ति को ही प्रत्येक प्राकृतिक घटना का हेतु मानता है। ३.प्रत्यक्षवादी- यह ज्ञान के विकास की सर्वोच्च अवस्था है। मनुष्य दैवीय तथा अमूर्त शक्तियों का परित्याग करता है। अपने अनुभव तथा प्रेरक्ष को ही ज्ञान का आधार बनाता है तथा सर्वव्यापी प्राकृतिक को खोजता है। प्रत्येक समस्या पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करता है। विज्ञान को महत्ता प्राप्त होती है। उम्मीद  है आप मेरी शंकाओं का समाधान करेंगे। तथा अपने आलेख  को के संबंध  में यदि कोई  विश्वसनीय प्रमाण  दें तो आपका आभार व्यक्त करूँगा।

satish3840 के द्वारा
June 10, 2012

मालिक साइमा जी आदाब अर्ज हें / आप भी कमल हें अपनी पोस्ट पर खुद ही टिप्पणी कर रहीं हें / खैर जो भी अंदाज आपका अच्छा लगा /काफी रोचक लिखा हें आपने

malik saima के द्वारा
June 10, 2012

जीसस और भारत के विषय में दुर्लभ जानकारी ,और इतिहास के गुमनाम अध्याय के खोये पन्नो से सटीक और अविस्मरनीय जानकारी समेटे एक लेख पढने के लिए वेब लिंक – http://ausafmalik01.jagranjunction.com/?p=434

Sumit के द्वारा
June 9, 2012

अगर इसे थोडा और विस्तार से लिखते तो ,,,ज्यादा अच्छा लगता …………………

malik saima के द्वारा
June 9, 2012

जाने ईसा को एक नए रूप में एक अविश्वसनीय और अविस्मर्णीय ऐतिहासिक लेख जानो सच को जानो खुद को:वर्तमान,अतीत और भविष्य को अपने देश और अपनी धरती को अपनी मात्र भाषा में


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